कौन बनाता है भारतीय मुसलामानों को संदिग्ध ?

जेंटलमैन, ब्लड ईज थिकर दैन वाटर

मोहम्मद अली जिन्ना


सुशील कुमार
सुशील कुमार

नेहरु और जिन्ना ने तो अपने स्वार्थ के कारण मुल्क को दो टुकड़ों में बाँट दिया लेकिन भारतीय मुसलामानों को अपनी मिटटी जुदा न कर सके| हिन्दुस्तान में रहने वाले मुसलामानों नें जिन्ना की जज्बाती बातों से बहुत आगे जाकर यह फैसला किया कि हम इसी भारत में रहेंगे जिसे धर्म के नाम पर बांटा जा रहा है क्यूंकि यही हमारा घर है | इस देश की मिटटी को मुसलामानों नें माथे से लगा लिया और आखरी सांस के बाद इसी मिटटी में दफ़न हो जाने का फैसला किया | हम उन देशभक्त मुसलमानों के वंशजों को संदिग्ध कैसे कह सकते हैं भला ?


सत्ता के लोभियों ने जंग-ए-आज़ादी के दौर से ही मुसलामानों के साथ खेलना शुरू कर दिया था| कभी मज़हबी हिंसा में झोंक कर तो कभी भेदभाव करके, मुस्लिम कौम का वोट की राजनीती करने वालों नें भरपूर दोहन किया है| नेहरु और जिन्ना ने तो अपने स्वार्थ के कारण मुल्क को दो टुकड़ों में बाँट दिया लेकिन भारतीय मुसलामानों को अपनी मिटटी जुदा न कर सके| जिस देश में अशफाकुल्लाह जैसे शहीद रत्न नें भारत माँ के दामन को दागदार होने से बचाने के लिए अपने जान की कुर्बानी दे दी, उस देश का मुसलमान जिन्ना के बहकावे में भला कैसे आ सकता था ?

मुल्क का बंटवारा होना जब लगभग तय हो गया था, उसी समय लाहौर लाँ कॉलेज में एक दिन मोहम्मद अली जिन्ना का भाषण हुआ| कुलदीप नैय्यर (वरिष्ट पत्रकार) उस समय वहां पढ़ाई कर रहे  थे| जब जिन्ना का भाषण ख़त्म हुआ तो नैय्यर साहब नें उनसे पुछा कि जब देश बाँट दिया जायेगा और उसके बाद कभी अगर भारत पर कोई आंच आती है तो पाकिस्तान का रवैया क्या होगा? इस सवाल पर जिन्ना ने कहा था जेंटलमैन, ब्लड ईज थिकर दैन वाटर ! मतलब साफ़ था कि भारत और पाकिस्तान का खून का नाता है और खून हमेशा पानी से गाढ़ा होता है| बहरहाल, पचास फीसदी से ज्यादा मुस्लिम आबादी वाले इलाकों को चिन्हित करके भारत माँ के सीने पर स्वार्थ के खंजर से लकीर खींच कर पाकिस्तान बना दिया गया |




आज लगभग सात दशक हो गए लेकिन इस देश में मुसलमान बेख़ौफ़ नहीं है| सहमा है, संदिग्ध समझा जाने लगा है और गंभीर भेदभाव का शिकार है| लम्बी दाढ़ी और सफ़ेद टोपी वाले ये कौन लोग हैं जिन्हें संदिग्ध निगाहों से देखने की मुहीम कुछ अलगाववादी-कट्टरपंथी संगठन चला रहे हैं? आखिर अपने ही घर में शक के दायरों में कैद होते जा रहे बहन-भाईयों को नजदीक से कोई देखने की कोशिश क्यों नहीं कर रहा है? ये लोग जो अपने-अपने तरीकों से राष्ट्र की तरक्की में योगदान दे रहे हैं, आखिर पिछड़े और वंचित क्यूँ हैं? भारत में मुसलमान खुद को ठगा हुआ और बेबस महसूस करने लगे हैं| यहाँ मुसलमान घोषित रूप से काफ़िर तो नहीं कहे जाते हैं लेकिन गंभीर भेदभाव का शिकार जरूर हैं| पिछले कुछ वर्षों में ऐसे अनेक छोटे-बड़े आन्दोलनों का उदय और विकास हुआ है जो मुसलामानों को लक्ष्य बनाकर उन्हें आक्रमणकारियों का वंशज और आतंकियों का समर्थक साबित करने में जुटे हैं| ऐसा करने के लिए चाहे इस संगठनों को अंधराष्ट्रवाद का सहारा लेना पड़े या तथाकथित विकास का, वे बड़ी आक्रमकता के साथ अपने काम में जुटे हैं| देश के लिए यह जानना जरूरी है कि अंधराष्ट्रवाद की आड़ में वे कौन लोग हैं जो फिरकापरस्ती की आग को हवा दे रहे हैं? इसकी भी पड़ताल जरूरी है कि आखिर क्या कारण है कि चाहे शिक्षा की बात हो, रोजगार की, स्वास्थ्य की या राजनैतिक भागीदारी की, मुसलमान हर जगह पिछड़ा हुआ नज़र आता है? इन सवालों का जवाब ढूंढने के लिए इसके राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और धार्मिक पहलुओं पर विचार करना होगा|

भारतीय समाज में धर्म की दखलअन्दाजी जबरजस्त है और जनमानस में इसकी पैठ गहरी है| धर्म के ठेकेदारों को इस बात का इल्म है और वे धर्म की आड़ में अपने मनचाहे मकसद पूरा कर सकते हैं| यहाँ धर्म में कब राजनीती और राजनीती में कब धर्म का धालमेल कर दिया जाता है, पता ही नहीं चलता| चाहे कोई भी पंथ या कौम हो, धर्म के नाम पर लोगों की जनभावना का दोहन करने में पीछे नहीं है| इसी का नतीजा है कि कोई जनसँख्या वृद्धि को किसी एक धर्म की सुनियोजित योजना बताता है तो कोई जनसँख्या नियंत्रण को धर्म विरोधी| फिर कोई धार्मिक नेता या गुरु सामने आता है और दुसरे धर्म की  धार्मिक झाँकियों को अपने धर्मस्थल के सामने से गुजरने से अपने इबादतगाह के नापाक हो जाने का प्रचार करता है|

मेरा एक दोस्त मुझसे हमेशा कहता था – “यार ये मुसलमान अपने मस्जिदों में किसी गैर मुस्लिम को नहीं जाने देते हैं|” मैंने एक दिन उसे चाँदनी चौक बुलाया और फिर जामा मस्जिद ले गया| डरते डरते वह सीढियों पर चढ़ने लगा और बोला – “यार कुछ होगा तो नहीं ?”  मैंने  उसको यकीन दिलाया कि यह उपर वाले का घर है और यहाँ किसी के आने-जाने पर मनाही नही है| अगर ऐसा होता तो दरवाजे पर ही लिखा होता कि गैर-मुस्लिम का प्रवेश वर्जित है| जैसा कई मंदिरों में दलितों और महिलाओं के लिए लिखा होता है| बहरहाल, हम दोनों गैर मुस्लिम जामा मस्जिद में दाखिल हुए और काफी देर तक जामा मस्जिद में रहकर लोगों को बंदगी करते देखते रहे| मैं दावे के साथ तो यह नहीं कह सकता कि वह कट्टर से सहिष्णु बन गया लेकिन उस दिन के बाद मेरे दोस्त के नज़रिए में बदलाव आ गया|

इसी तरह ज्यादा बच्चे पैदा करने का इल्जाम भी सुनियोजित तरीके से एक धर्म विशेष पर लगाया जाता है जो कि सरासर गलत है| अगर मैं अपने गाँव में देखूं तो एक एक दम्पत्ति को बारह से पंद्रह बच्चे हैं और वे गैर-मुस्लिम हैं| खुद मेरे चाचा के ग्यारह बच्चे हैं और एक सुप्रसिद्ध हिन्दू भूतपूर्व केन्द्रीय मंत्री को ही देख लीजिए, उनके नौ बच्चे हैं| हिन्दू धर्म ग्रंथों में तो एक दंपत्ति के सौ पुत्र होने की बात कही गयी है|




दुनियाँ के किसी भी धर्म की पवित्र किताब में “परिवार नियोजन” के विरुद्ध कुछ भी नहीं लिखा गया है| ये तो बीच में धर्म की ठेकेदारी करने वालों ने लोगों का बुरा हाल बना दिया है| परिवार छोटा हो तो ही सबकी देख-रेख पूरी तरह से हो सकती है लेकिन बड़े परिवार सिर्फ किसी धर्म-विशेष में ही मिलते हैं ऐसा कहना गलत होगा|

सवाल यह है कि हम अगर दुसरे किसी धर्म को जानने और समझने की कोशिश ही नही करेंगे तो सम्मान का भाव कहाँ से आएगा? हमारे विद्यालयों में त्योहारों के लिए दी जाने वाली छुट्टियाँ सिर्फ मौज मस्ती के दिन की तरह होती हैं| जो जिस धर्म से ताल्लुक रखता है उसे तो माँ-बाप या समाज से उस धर्म विशेष के पर्व के लिए मिलने वाली छुट्टी के दिन का महत्व शायद पता चल जाता है लेकिन दुसरे धर्म के बच्चों के लिए पर्व-त्यौहार की छुट्टी मतलब सिर्फ मौज-मस्ती का दिन होता है| कितना अच्छा होता अगर मुसलमान बच्चों को भी पता होता की दिवाली राम के आयोध्या लौटने की ख़ुशी में मनाया जाने वाला पर्व है जिसका मतलब है अँधेरे पर उजाले अर्थात असत्य पर सत्य की जीत| या फिर हिन्दू, ईसाई या सिख बच्चों को पढाया जाता कि ईद-उल-फितर, शबेबारात या रमजान का क्या महत्व है? गुड फ्रायडे, नानक जयंती या बुद्ध पूर्णिमा का महत्त्व सभी धर्म के बच्चों को पढ़ाया जाता तो बचपन से ही सभी धर्मों के प्रति एहतराम (सम्मान) पैदा होता| इस तरह से शिक्षित बच्चे जब बड़े होते तो पूरी जिम्मेवारी से सभी धर्मों के को सम्मान की नजर से देखते और देश के अच्छे नागरिक बनते| ऐसी शिक्षा दी जाए तो एक नास्तिक भी अपने विचारों को महत्त्व देते हुए दुसरे धर्म का सम्मान कर सकता है और इसके विपरीत धार्मिक लोग भी एक नास्तिक के मत को सम्मान दे सकते हैं| अभी तो नास्तिकता का मतलब सीधे-सीधे अधर्मी होना या धर्म-विरोधी होना माना जाता है| दुनियाँ में नास्तिकों की संख्या करोड़ों में है और उनको भी आस्तिकों की तरह यह अधिकार है कि वे किसी भगवान या बुत की उपासना न करते हुए अपना जीवन जीयें या अपनी सोच-समझ का प्रचार-प्रसार करें|




सवा सौ करोड़ के इस देश में जनगणना के हाल के आंकड़ों में मुस्लिम आबादी सिर्फ 17 करोड़ दर्ज हुई है| इसका मतलब यह हुआ की एक गैर मुस्लिम होने के नाते अगर मेरे सौ दोस्त हैं तो उनमें पंद्रह मुस्लिम भी हो तब तो मैं कह सकता हूँ कि मैं मुस्लिम समाज को समझने में रूचि रखता हूँ या ऐसा कहने का मुझे हक भी है| दुर्भाग्य से ज्यादातर लोग ऐसा नहीं कर पाते और नतीजा यह होता है कि वे किसी अंधराष्ट्रवाद का जहर घोलने वाले संगठन के बहकावे में आकर बेबुनियाद आक्षेप और मनमुटाव पालने लगते हैं|

Indian_Muslims
भारत के लिए अपना खून-पसीना बहाने वाले अनगिनत मुसलामानों में कुछ नामचीन चेहरे जिनकी असली पहचान किसी धर्म विशेष की मोहताज नहीं है|

क्या मुसलामानों की मौजूदा हालात के लिए मुस्लिम समाज के अंदरूनी कारण भी जिम्मेवार हैं? हम इस बात से भी पूरी तरह इनकार नहीं कर सकते कि भारत का मुस्लिम समाज अभी धर्म के ठेकेदारों की गिरफ्त से आज़ाद नहीं हो पाया है| कुछ ही दिनों पहले मैनें एक आर्टिकल फेसबुक पर लिखा था जो कि फतवों के बारे में था| कुछ प्रगतिशील मुस्लिम भाईयों नें उस लेख का स्वागत किया लेकिन ऐसे भी मुसलमान भाई और मौलवी-मौलाना थे जिन्होंने कहा कि इस्लामिक विषयों पर लिखने का मुझे कोई हक ही नहीं है| मैं समझता हूँ कि कौम के ऐसे   दकियानूस मौलवी, जो इस्लाम को अपनी मल्कियत समझते हैं, भी जिम्मेवार हैं भारत में मुसलामानों के पिछड़ेपन के लिए| तालीम से ज्यादा धनराशी भव्य भवन-निर्माण में धड़ल्ले से खर्च किए जा रहे है| बात-बात पर अजीबोगरीब फतवे जारी कर दिए जाते हैं| कई फतवे मजहबी पंडितों के लिए वाजिब जरूर लगते होंगे लेकिन एक आम मज़हबपरस्त इंसान के लिए जी का जंजाल भी बन जाते हैं| मौलानाओं द्वारा जारी फतवे भी कमाल के होते हैं जैसे ”दवा में अल्कोहल का इस्तेमाल हराम है”, या ”औरतों को नौकरी नहीं करनी चाहिए”, या ”कैमरेवाले मोबाईल गैर इस्लामी हैं”, या ”लड़के-लड़कियों की पढाई साथ-साथ नहीं होनी चाहिए”, या इस्लाम टेस्ट-ट्यूब बेबी की इजाजत नहीं देता” इत्यादि | फ़तवा कोई सामान्य आदेश नहीं होता है बल्कि इसके साथ इसे मानने की पाबन्दी जुडी होती है| इसके साथ साथ भारतीय मुस्लिम समाज आज जात-पात और भेद-भाव के कुचक्र में भी फंस कर पिछड़ रहा है| पसमान्दा मुसलामानों के साथ अपने ही कौम में जबरजस्त भेदभाव बरता जा रहा है| अनेक इदारे और मुस्लिम नेतागण अपने कौम का स्तर उठाने के किये कार्यरत हैं लेकिन ये सारे प्रयास सूरत-ए-हाल बदलने के लिए नाकाफी हैं| इन सब का नतीजा है कि मुसलामानों में भी प्रतिक्रियावश धर्म परिवर्तन के मामले तेजी से सामने आ रहे हैं| मुसलामानों को सॉफ्ट टार्गेट की तरह क्रिसचन मिशनरियाँ बहुत पहले से ही देखती  चली आई हैं| कुछ मिशनरी संस्थाए विशेष तौर पर मुसलामानों का धर्म परिवर्तन करवाकर उन्हें ईसाई बनाने के काम में जुटीं हैं| कई अलग पंथों जैसे निरंकारी, डेरा सच्चा सौदा और जुम्मा मसीह वरशिप फेलोशिप आदि मुस्लिम भाई-बहनों को, कुरआन की अपने -अपने ढंग से व्याख्या करके लुभा रहे हैं| और तो और आर.एस.एस. के कुछ भगवा मौलाना कई भारतीय शहरों के मुस्लिम बहुल इलाके की गलियों में घूमकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सिद्धांतों का प्रचार कर रहे हैं। ये लोग मुस्लिम बहुल इलाकों में प्रचार कर रहे हैं। ऐसे ही कुछ भगवा मौलानाओं में गुजरात में दंगों के कुछ साल बाद मुसलमान बस्तियों में जा-जा कर यह प्रचार किया कि दंगों में जो नुक्सान होना था वो तो हो गया लेकिन अब सरकार और भगवा ताकतों को मौका देकर देखिए आगे सब ठीक होगा| यह बात अलग है कि गुलबर्ग सोसाइटी के पीड़ितों की तरह कुछ मुसलामानों ने इन संघी मौलानाओं को नकार दिया और अपनी लड़ाई को सुप्रीम कोर्ट तक ले गए| गौरतलब है कि हमेशा से कट्टर हिंदुत्व की बात करने वाला आरएसएस आज-कल अपने साथ मुसलमानों को जोड़ने की मुहिम चला रहा है। यहाँ तक कि मुस्लिम महिलाओं के बीच संघ का एक अलग संगठन काम कर रहा है| संघ और बीजेपी गैर-मुस्लिम वोटों को एकजुट करने का सबसे शॉर्टकट तरीके को अपनाते चले आए है| वो रास्ता यह है कि देश में मुसलामानों को संदिग्ध और आतंकियों का समर्थक बता कर समाज में खौफ का वातावरण तैयार किया जाए, जिससे गैर-मुस्लिम वोट एकजूट हो सके|

भारत के मुसलमानों को नापाक मानने और संदेह भरी निगाहों से देखने से पहले यह बात सोचने की ज़रूरत है कि चाहे राजनीति हो या कला जगत, खेल हो या साहित्य जगत, शिक्षण हो या कारोबार , मजदूरी हो या कारीगरी, इस देश का हर मुसलामान अपने-अपने तरीके से राष्ट्र निर्माण में ईमानदारी से योगदान दे रहा है |




जंग-ए-आज़ादी के दौरान जिस देशभक्त मुस्लिम कौम नें जात-धर्म की परवाह किये बगैर फिरंगियों के नाक में दम कर दिया था, आजाद होते ही उससे कहा गया कि तुम्हारे पास विकल्प है चाहो तो पकिस्तान चले जाओ | हिन्दुस्तान में रहने वाले मुसलामानों नें जिन्ना की जज्बाती बातों से बहुत आगे जाकर यह फैसला किया कि हम इसी भारत में रहेंगे जिसे धर्म के नाम पर बांटा जा रहा है क्यूंकि यही हमारा घर है | इस देश की मिटटी को मुसलामानों नें माथे से लगा लिया और आखरी सांस के बाद इसी मिटटी में दफ़न हो जाने का फैसला किया | हम उन देशभक्त मुसलमानों के वंशजों को संदिग्ध कैसे कह सकते हैं भला ?

लेखन / प्रस्तुति :

सुशील कुमार
सुशील कुमार
लेखक हिंद वॉच मीडिया समूह के संपादक हैं| हिंद वॉच मीडिया जमीनी सरोकारों से जुड़ी जनपक्षधरता की पत्रकारिता कर रही है| समूह अपने साप्ताहिक अखबार, न्यूज़ पोर्टल और सोशल मीडिया नेटवर्क के माध्यम से जमीनी और वास्तविक ख़बरों को निष्पक्षता के साथ अपने पाठकों तक पहुंचाती है| भारत और विदेशों में यह वेब पोर्टल पढ़ा जा रहा है|
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