क्या मुस्लिम मतदाताओं के हाथ में है उत्तर प्रदेश का सियासी भविष्य ?

अवैस अहमद उस्मानी

प्रदेश की सत्ता पर काबिज़ सपा ने कांग्रेस से हाथ मिला कर मुस्लिम वोटों के ध्रुवीकरण को रोकने की जोरदार कोशिश की है| भाजपा कैराना के पलायन और राम मंदिर के मुद्दे के को गरमाकर हिन्दू वोट को एकजुट करके लोकसभा चुनाव की तरह जीत दर्ज करने ने की फ़िराक में नजर आ रही है| गरम लोहे पर हथौड़ा मारते हुए बसपा सुप्रीमो मायावती ने यह कहकर कि चुनाव परिणामों की घोषणा के बाद किसी भी कीमत पर बसपा का बीजेपी के साथ गठबंधन नहीं होगा, मुस्लिम मतदाताओं का विश्वास जीतने की कोशिश की है| अब चुनाव के नतीजों के लिए 11 मार्च तक इन्तजार करके कि इस बार उत्तर प्रदेश के मुस्लिम मतदाता महज वोट बैंक ही साबित होते हैं या वे सूबे की राजनीति की दिशा और दशा बदलने का माद्दा भी रखते हैं|​


उत्तर प्रदेश में चुनावी तापमान के ऊपर चढ़ते ही शुरूआत में तो ऐसा लगा था कि इस बार शायद चुनाव का मुद्दा विकास होगा| अब जब पहले चरण का मतदान हो चुका है यह साफ़ हो गया है कि खोलकर साम्प्रदायिक या सेकुलर कहलाने वाली सभी पार्टियों का असली चुनावी मुद्दा विकास नहीं बल्कि जाति और धर्म है| हलाकि अभी भी कुछ पार्टियाँ ने प्रचार सामग्रियों में विकास पर जोर दिया है लेकिन व्यावहार में उनके उम्मीदवारों की चयन प्रक्रिया और चुनावी भाषणों से यह साफ़ हो गया है कि विकास के नारों के शोर में सभी दल जातिगत और धर्म आधारित राजनीति के दलदल में गुत्था-गुत्थी कर रहे हैं| लगभग सभी दल जाति-धर्म आधारित लुभावने वादे करके मतदाताओं को लुभाने में जुटे नजर आ रहे हैं| वैसे उत्तर प्रदेश के चुनाव में सबसे अहम किरदार धर्म और जाति समीकरण का ही होता है| यही कारन है कि चाहे-अनचाहे हर किसी को यह करना पड़ता है|




उत्तर प्रदेश में हाल ही में 11 फ़रवरी को 73 विधानसभा सीटों पर सम्पन्न हुए पहले चरण का चुनाव हो या 15 फरवरी को होने वाला दुसरे चरण का चुनाव या फिर पूरे प्रदेश की ही बात कर लिए इस पूरे चुनाव में कही न कहीं धर्म और जाति के लोग ही चुनाव में सियासी पार्टियों की नैया पार लगाती है|

उत्तर प्रदेश में पहले चरण का चुनाव को शान्ति पूर्ण तरीके से सम्पन्न हो गया| यह चुनाव उत्तर प्रदेश की सियासत में अब आगे की रणनीति तय करेगा| इस इलेक्शन में एक बात सबसे ज्यदा खास थी वह यह की जिन विधानसभा सीटों पर 11 और 15 फरवरी को जो चुनाव होने वाला है उसमें सबसे अहम किरदार मुस्लिम  वोटरों का है| 26 जिलों में से 14 जिलों में मुस्लिम आबादी 20 से 50 प्रतिशत तक है| जिसमें 9 जिलों में 30 प्रतिशत से आधिक और 4 जिलों में 40 प्रतिशत से अधिक मुस्लिम हैं| अब उनके वोटों का बँटवारा हो या पूरा वोट एकजुट रहे दोनों ही परिस्थितियों में चुनावी नतीजों पर प्रभाव पडेगा| यहाँ पर सियासत में सक्रिय मुस्लिम नेता भी वोट के सवाल पर बटे हुए नज़र आ रहे हैं| जिसके आँखों पर जैसा चश्मा है, वह समुदाय को वैसी ही नजर से देखने के लिए प्रेरित कर रहा है| ज्यदातर  मुसलमान मतदाता की आम धारणा है कि भाजपा को सत्ता में आने से रोका जाए लेकिन भाजपा की जगह किसको लाया जाये इस पर सब की अलग-अलग राय है| मतलब आज भी सही और मजबूत विकल्प की तलाश में है उत्तर प्रदेश का मुस्लिम मतदाता| किसी सशक्त विकल्प की गैर मौजूदगी में कोई गठबंधन को जिताना चाहता है तो कोई बसपा या रालोद को| सबके नेता मुस्लिम मतदाताओं को अपने-अपने नज़रिये से लुभा रहे है|

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा मुसलमान रामपुर जिले में है| यहाँ उनकी आबादी 49 प्रतिशत है| तो वही सबसे कम मुसलमान पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सबसे अहम शहर अलीगढ में 17 फीसदी हैं| मुरादाबाद / संभल में जहाँ 45  फीसदी वहीँ अमरोहा में 41 फीसदी मुसलमान है| सहारनपुर में 39 फीसदी, मुज़फ्फरनगर में 38 फीसदी, बरेली में 33 फीसदी, मेरठ में 32 फीसदी, बागपत में 24, गाज़ियाबाद में 23 बदायूं में 21 और बुलंदशहर में 20 फीसदी मुस्लिमआबादी है|

अगर उत्तर प्रदेश में मुस्लिम एमएलए की बात करें तो आजादी के बाद से इनकी गिनती में उतार चढ़ाव आता रहा है| लेकिन हर बार औसतन 30 मुस्लिम एमएलए पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जीत ही जाते हैं| आजादी के बाद 1951 में जहां 44 मुस्लिम एमएलए पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जीते, वही 1967  में यह तादात आधी हो कर 24 तक आ गई | लेकिन 1985 में फिर एक बार मुसलमानों ने प्रदेश की सियासत में ज़ोरदार वापसी की और यह गिनती 50 तक आ पहुंची| वही पिछली तीन विधानसभाओं में यह तादात औसतन 50 से ऊपर ही रही| जहाँ 2002 में 44 विधायक जीते, वही 2007 और 2012 में 56  और 68 विधायकों ने जीत दर्ज की जो तादात के हिसाब से अब तक सबसे ज्यादा है| जहाँ 2012 सत्ता में काबिज़ हुई पार्टी सपा के 43 मुस्लिम विधायकों ने जीत दर्ज की वही बसपा और पीस पार्टी के 15 और 3 मुस्लिम विधायकों ने जीत दर्ज की|

अब देखना यह है की क्या हर बार की तरह इस बार मुस्लिम मतदाता उत्तर प्रदेश के चुनाव में अहम किरदार अदा करते है या नहीं| क्योंकि की इस बार जहाँ बसपा ने सबसे ज्यादा तक़रीबन 100 उम्मीदवारों को चुनाव मैदान में उतार कर मुस्लिम वोट को अपनी तरफ खीचने की कोशिश की है वही प्रदेश की सत्ता पर काबिज़ सपा ने कांग्रेस से हाथ मिला कर मुस्लिम वोटों के ध्रुवीकरण को रोकने की जोरदार कोशिश की है| भाजपा कैराना के पलायन और राम मंदिर के मुद्दे के को गरमाकर हिन्दू वोट को एकजुट करके लोकसभा चुनाव की तरह जीत दर्ज करने ने की फ़िराक में नजर आ रही है| गरम लोहे पर हथौड़ा मारते हुए बसपा सुप्रीमो मायावती ने यह कहकर कि चुनाव परिणामों की घोषणा के बाद किसी भी कीमत पर बसपा का बीजेपी के साथ गठबंधन नहीं होगा, मुस्लिम मतदाताओं का विश्वास जीतने की कोशिश की है| अब चुनाव के नतीजों के लिए 11 मार्च तक इन्तजार करके कि इस बार उत्तर प्रदेश के मुस्लिम मतदाता महज वोट बैंक ही साबित होते हैं या वे सूबे की राजनीति की दिशा और दशा बदलने का माद्दा भी रखते हैं|​




लेखन / प्रस्तुति :

अवैस अहमद उस्मानी
अवैस अहमद उस्मानी
लेखक हिंद वॉच डिजिटल के युवा पत्रकार हैं| हिंद वॉच मीडिया जमीनी सरोकारों से जुड़ी जनपक्षधरता की पत्रकारिता कर रही है| समूह अपने साप्ताहिक अखबार, न्यूज़ पोर्टल और सोशल मीडिया नेटवर्क के माध्यम से जमीनी और वास्तविक ख़बरों को निष्पक्षता के साथ अपने पाठकों तक पहुंचाती है| भारत और विदेशों में यह वेब पोर्टल पढ़ा जा रहा है|
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