दुनियाँ में दुख-दर्द के जो कारण हैं, उनसे जुड़ कर ही रहना चाहिए : भारत डोगरा

bharat-dograभारत डोगरा : संक्षिप्त परिचय

प्रमुख अख़बारों एवं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में विकास, पर्यावरण, विस्थापन, मानवाधिकार,जन-सरोकार एवं ज्वलंत सामाजिक मुद्दों पर लम्बे समय से हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओँ में 6000 से ज्यादा आलेख व रिपोर्ट लिखने वाले भारत डोगरा किसी परिचय के मोहताज़ नहीं हैं |

उन्होंने 250 से अधिक पुस्तक-पुस्तिकाएं लिखीं हैं जिनमे ‘Another Path Exists – Outlining An Alternative Society’, ‘Food Security in India – Alternative Policies and People’s Initiatives’, ‘The Encyclopedia of Development Environment and Welfare’ (in English and Hindi), ‘Creating A Happier World’, ‘What Our Children Will Inherit’, ‘Protective Role of Humankind’, ‘India-Hope and Despair’, ‘Earth History and the Next Century’,’14 Crucial Questions About GM Crops’, ‘रास्ते और भी हैं’, ‘उम्मीद मत छोड़ना (हिंदी कविताएँ)’ and ‘कैसा विकास किसका विकास’. आदि प्रमुख हैं |

वे इंस्टिट्यूट ऑफ़ सोशल साईंस, नई दिल्ली के फेलो तथा एन.एफ.एस.-इंडिया(अंग्रेजोऔर हिंदी) के सम्पादक हैं | उन्होंने अनेक एफ. एम. रेडिओ चैनलों एवं ऑल इंडियारेडिओ के लिए टॉक्स एवं अन्य कार्यक्रम किए हैं |

जन-सरोकारकी पत्रकारिता के क्षेत्र में उनके योगदान को अनेक पुरस्कारों से नवाजा भी गया है| उन्हें स्टेट्समैन अवार्ड ऑफ़ रूरल रिपोर्टिंग (तीन बार), द सचिन चौधरी अवार्डफॉर फाइनेंसियल रिपोर्टिंग, द पी.यू. सी.एल. अवार्ड फॉर ह्यूमन राइट्स जर्नलिज्म,द संस्कृति अवार्ड, फ़ूड इश्यूज पर लिखने के लिए एफ.ए.ओ.-आई.ए.ए.एस. अवार्ड, राजेंद्रमाथुर अवार्ड फॉर हिंदी जर्नलिज्म, शहीद नियोगी अवार्ड फॉर लेबर रिपोर्टिंग,सरोजनी नायडू अवार्ड, हिंदी पत्रकारिता के लिए दिया जाने वाला केंद्रीय हिंदी संस्थान का गणेशशंकर विद्यार्थी पुरस्कार समेत अनेकों पुरुस्कारों से सम्मानित किया गया है |लेखन कार्य के अलावा श्री भारत डोगरा जन हित ट्रस्ट के अध्यक्ष भी हैं |

प्रस्तुत है वरिष्ट स्वतंत्र पत्रकार एवं जन-सरोकार के लेखक भारत डोगरा से हिंद वॉच के संपादक सुशील कुमार की उनके निवास स्थान पर हुई बातचीत का मुख्य अंश :

आपको सामाजिक सरोकारों पर लेखन के लिए पहचाना जाता है। आपको कब लगा कि लोगों से जुड़े मुददों पर ही काम करना चाहिए ?

जब मैं अपपने कॉलेज में पढ़ता था तो मात्र शौकिया तौर पर लेखन किया करता था। उस समयकुछ लेखन किया, पर इस तरह के विषय पर नहीं। उनमें से कुछ प्रकाशित हुआ | मेरे मनमें आया कि एक स्वतंत्र लेखक रह के भी जिया जा सकता है। उसके बाद मेरे मन में आयाकि पूरी जिंदगी लेखन में बितानी है तो सबसे प्रासंगिक एरिया क्या हो सकता है? उस समय मेरे मन में आया कि गरीबी केसमस्या को उठाना चाहिए। उस को लेकर गांवों में जाना शुरू किया। अनेक सामाजिक कार्यकर्ताओंसे, आंदोलनों के लोगों से मिला । जिससे समझ का दायरा व्यापक हुआ। ये पता चला किगरीबी पर लिखना है तो पर्यावाण पर भी लिखना जरूरी है। और उसके साथ ही गरीबी के साथऔर जो व्यापक मुददे है, अपने आप जुड़ते चले गए।

आजकल समाज में दूर दराज के इलाको में अनेक लोग समाज के लिए काम कर रहे हैं। ऐसे लोग सुर्ख़ियों से परे है। आपको क्या लगता है कि ऐसे लोगों की कहानी को सामने लाया जाए जो कि लोगोंके लिए प्रेरणा का स्रोत बन सके। इस तरह की रिपोर्टिगं मीडिया में बहुत कम हो पातीहै, इस पर आपका क्या कहना है?

आपने बिल्कुल सही कहा हमारे देश की एक खास विशेषता है कि हमारे देश में अनेक विषयों कीमांगों को लेकर विविध तरह के छोटे-बडे़ आंदोलन होते रहते है। जिसमें से ज्यादातर अहिंसक हैं। यह इस देश की बहुत बड़ी ताकत है। क्योंकि इसके माध्यम से लोग जुड़तेहै। युवा भी इस तरह के आंदोलन में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेते है। पर दुर्भग्यपूर्ण है कि सरकारी तंत्र इसे सही रूप में नहीं लेते और प्रायः इन आंदोलनों को दमन वउत्पीड़न का सामना करना पड़ता है। जबकि एक लोकतान्त्रिक देश में यदि कोई शांतिपूर्ण तरीके से मांग उठ रही है तो उस पर ध्यान देना चाहिए। यही कारण है कि जब शातिंपूर्ण तरीके से सामाधान नहीं होता तो फ्रस्ट्रेशन उत्पन्न होती है। जहां तक मीडिया का सवाल है तो जो बहुत बड़े प्रयास होते हैं, वो तो मीडिया में आ जाते है।पर बहुत कुछ उपेक्षित रह जाता है। कुल मिलाकर मीडिया में एसे प्रयासों को जो स्थान मिलना चाहिए वो नहीं मिल पाता है। इनमें बहुत से संगठन हैं जो बहुत छोटे हैं लेकिनउनकी बातें प्रासंगिक हैं| उनकी बातें दबी रह जाती हैं। जैसे मेरे जैसे लेखक जोकाफी समय से लिख रहा है, उसको भी जगह पाने के लिए काफी प्रयास करना पड़ता है। मुझे भी यह कमी महसूस होती है। ऐसे मुद्दों की रिपोर्टिग करके आ गए है, लेकिन कहां छपेगा, कैसे छपेगा यह समस्या बनी रहती है।

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भारत डोगरा के रचना संसार की कुछ पुस्तकें

ऐसे समय में क्या मीडिया को भी अपने सामाजिक दायित्वों की ओर पलट कर देखने की आवश्यकता है?

मुझे लगता है कि आप जैसे सोशल मीडिया के लोग जो इन मुददों को लेकर वेबसाइटस और पोर्टलका उपयोग कर रहे हैं। शायद उससे भी कुछ नए रास्ते निकल आए। जो बात प्रिंट माध्यम से नहीं हो पाती है, वो शायद इस माघ्यम से हो जाए। अल्टरनेटिव मीडिया का भी उपयोगहै। प्रिंट मीडिया का भी उपयोग है| छोटे-बड़े पत्र-पत्रिकाओं से इस बात को फैलाने की कोशिश करते हैं लेकिन फिर भी लगता है कि बड़े प्रिंट मीडिया का अपना स्थान है।जमीनी मुददों को लेकर अंग्रेजी मीडिया की स्थिति हिेंदी मीडिया से भी चिंताजनक है।पर हिंदी मीडिया में भी उसका स्थान सिकुड़ रहा है। मुझे लगता है कि मीडिया में भी बहुत से लोग है जो इन कमियों को महसूस करते है। जैसे कुछ लोग जो मेरा लिखा नहीं छाप पाते है। साहानुभूति उनकी भी होती है। वे लोग भी कहते है कि आप अच्छा काम कररहे है और ये छपना चाहिए। मैं तो बहुत पहले से लिख रहा हूं इसलिए छप जाता है। परमुझे लगता है कि जो नए लेखक उन मुददों पर लिखना चाहेंगे तो उनकी कठिनाई ज्यादाहोगी। हमें इस पर कई स्तरों पर कोशिश करनी होगी। समस्या के बारे में कहते रहने से काम नहीं चलेगा| इसके लिए हमें सामाधान निकालने होंगे। जैसे आप प्रयास कर रहे है,इस प्रकार के कई छोटे-छोटे प्रयास करेंगे तो शायद हम इस कमी को पुरा कर सकेंगे ।

सर, आपकी संवेदनाए जन-सरोकारों, जनआंदोलनों से बड़ी सहजता से जुड़ जाती है। आपके जैसेलेखन करने वाले, जो विविधरंगी लेखन से परहेज करते है और जनमानस के भवनाओं को कलम के माध्यम से उजागर करते है, के मार्ग में क्या-क्या चुनौतियां है ?

इस तरह के लेखन को पूर्णकालिक करके आजीविका प्राप्त करना बहुत मुश्किल है। जैसे मैंबिल्कुल सादगी पूर्ण जीवन जीता हूँ। दिल्ली जैसे शहर में रहना भी मुश्किल होता है। मेरी पत्नी का सहयोग बहुतमिला मुझे लेखन में, प्रोफेशनल खर्चे भी बहुत है। यदि आपको ठीक से लेखन करना है तोअघ्ययन बहुत करना है। उसके लिए आपको बहुत सी पुस्तकें लेनी पड़ेगी, या़त्रा करनीपड़ेगी। इसमें हर कदम पर खर्च होता है। ये अपने आप में बहुत काम मुश्किल है। एक तरह से देश में तो आजादी है कुछ भी करने का. पर करना बहुत कठिन है। इस प्रकार के लेखन में कुछ नए साथी आए पर कुछ समय बाद वे नहीं टिक सके। ऐसा नहीं है कि ऐसा लेखन करके वे जॉब नहीं कर सकते लेकिन ऐसे कितने जॉब है जिसमें वे इस काम को कर सकते है?मैंने अपनी आर्थिक समस्या को दूर करने के लिए और भी बहुत काम साथ-साथ किए| जैसे किकोई छोटा सा रिसर्च, कोई डाक्यूमेंटेशन का काम, किताबें लिख दी तो इसकी भी थोड़ीबिक्री होने लगी। लेकिन आर्थिक पक्ष तो एक पक्ष है लेकिन दूसरा पक्ष है कि यदि आपकिसी तरह अपना गुजारा कर भी लें काफी मेहनत करके, दूर दूर जाकर जानकारी इकटठा करले, उसके बाद आप चाहेंगे कि कहीं छप जाए पर इसकी कोई गांरेटी नहीं है। अभी भी मैं कहीं जाता हूँ तो सोचता हूं कि कहां पर छप जाएगा। ये चुनौती बनी रहती है।

भारत में अहिंसक आंदोलनों की परम्परा रही है। आज नए युवा भी अहिंसक आंदोलनों से जुड़रहे है। जबकि अन्य कुछ देशों में खूनी क्रांति के जरिए तख्ता पलट हुआ है। आज केसमय में अहिंसक आंदोलन कितना प्रासगिक है?

दुनियाँ में विज्ञान और तकनीकि का गलत उपयोग करके अनेक हथियार बन गए। जब इतने अघिक विनाशकारी हथियार के भंडार इकठ्ठा हुए हैं। मान लीजिए कि कुछ सौ साल पहले कोई क्रूर शासक भी हो, तो उसके पास जिस तरह के हथियार से, निर्दयता के बावजूद भी, कितना विनाश करलेता। आज चार-पांच आतंकवादी के पास ही उससे ज्यादा विध्वंसक हथियार आ जाए तो वोविनाश कर लेगा।  इस स्थिति में एक अहिंसक सोच को आगे बढ़ाना आवश्यक है। में अन्याय नहीं सहना है लेकिन अन्याय का विरोध अहिंसक रास्ते से भी हो सकता है। भारत इसकी एक बहुत अच्छी प्रयोगशाला रही है। लेकिन शासक वर्ग को इस ओर ध्यान देना चाहिए कि जिन्होंने अन्याय सहा है या जो लोग वंचित है, वे लोग जब आवाज उठाते है तो उनके आवाज पर घ्यान देना और उनका उत्पीड़न न करना| यदि यहभी हमारे लोकतंत्र में ठीक ढंग से हो जाय तो मुझे लगता है कि वास्तव में हम अहिंसक आंदोलन की परम्परा को कायम रख पाएंगे । परम्परा समृद्ध तब लगती है जब सामाधान होते हुए नजर आए। अनेक आंदोलन हुए जैसे कि नर्मादा बचाओ आंदोलन में कार्यकर्ताओं ने बड़े सॉलिड सबूत इकठा किए, दुनिया के विशेषज्ञों द्धारा इसका समर्थन भी मिला। उसके बावजूद भी सरकार ने उस पर जरा सा भी ध्यान नहीं दिया। विस्थापितों को न्याय देने की मांग हुई उसमें से भी कभी उनको जल सत्याग्रह करना पड़ता कभी धराना करना पड़ता है तब सरकार आधा-अधूरा सुनती है।

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आपके लेखन के बहुत से आयाम है । पर आपने बियर फुट कालेज जैसी पुस्तक लिखने का क्योंसोचा ?

मुझे लगता है कि उसकी अपनी एक खास देन है। साधारण गांव वासियों की क्षमताऐं अघिक हैं।जो पहचानी नहीं जाती है। हम ये सोचते हैं कि जो डिग्री प्राप्त करेंगे, उनमें ही क्षमताऐंहैं। लेकिन आम गांव वासियों की क्षमताऐं छुपी रह जाती है। जैसे कि छत्तीसगढ़ मेंआदिवासी गांव में चावल के कई किस्मों को जिंदा रखा गया है। आज की हरित क्रांति मेंतो उसका सोच भी नहीं सकते। यह बिल्कुल मानो कल्चर है। और बिल्कुल जैव-विविधता कोखेतों में ही बचा के रखा जा सकता है। जमीनी समस्याओं के सामाधान की क्षमता जितनागांव वासियों, किसानों और दस्तकारों में आ सकता है। उतना डिग्री धारकों में नहीं आसकती है। उनके पास व्यवहारिक ज्ञान है। बियर फुट कालेज की खास बात है कि जो गांवकी छिपी हुई प्रतिभा है, उसको आगे लेकर आएं, उस विषय को मैने सामने लाने की कोशिशकी ।

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भारत डोगरा के किताबों की दुनियां

वर्त्तमान गांवों के विकास का मॉडल और गांघी के ग्राम स्वराज्य पर आधारित ग्रामीण विकास मॉडल पर आपकी व्यक्तिगत राय क्या है ?

मुझे लगता है कि जो गांघी जी की आर्थिक सोच थी। उसमें उन्होंने आत्मनिर्भर गावों पर जोरदिया है। आज के समय में हर चीज के लिए डिपेंडेंस की बात हो रही है। किसान की बात करे तो लगभग पचास-साठ साल पहले तक बहुत से मामलों में किसान आत्मनिर्भर था। बीज उसके होते थे। खाद वो खुद बना लेता था। उन्होंने ये पहचाना कि केवल खेती आजीविकाका पूरा जरिया नहीं हो सकती। इसका मतलब खेती के अलावा अन्य आजीविकाएं भी होनीचाहिए। जीवन में उपयोग होनो वाली अधिकतम जीजों का उत्पादन स्थानीय स्तर पर हो सकताहै। उनका ये कहना नहीं था कि बड़ी कम्पनी का उत्पादन न हो। विदेशों से आयात न हो। लेकिन लोकल उत्पादन लोकल स्तर ही पर होना चाहीए। मुझे लगता है कि इस बात को अपना लें और आत्मनिर्भरता कर लें तो जितनी आर्थिक संकट है, दूर हो जाएगी। इस मामले में गांघी जी के स्वराज्य का नियम बहुत प्रासंगिक है।

गांव-देहातऔर दूर दराज के इलाकों में घूमने और समझने के बाद स्वयं-सेवी संस्थाओं की भूमिका पर आपकी क्या राय है?

सामाजिक कार्यकर्ता अपने संकीर्ण स्वार्थो से उपर उठ कर आगे आकर यह देखें कि समाज-समुदाय केलिए क्या जरूरी है? उसके साथ अपने को जोड़ कर चले। इस तरह के सामाजिक कार्यकर्ताओंके लिए  सपोर्ट सिस्टम कुछ होना चाहिए| सबसे अच्छी बात है कि समुदाय ही उनको सपोर्ट करे, उसमें कुछ समस्याएं आने लगी तो फंडिग की बात सोची गई। अपने मि़त्र उस काम में सहायता करें, यहां तक तो बात ठीक है। लेकिन समस्या तब हो जाती है जब फंडिग ज्यादा हावी हो जाती है। सामाजिक कार्यकर्ताअपने जीवन यापन और सामाजिक कार्य करने के लिए सहयोग मिलने की अपेक्षा रखे तो यह आवश्यक भी है। लेकिन ज्याद फंड इकठा करने की बात होगी तो सामाजिक कार्यकर्ता और अन्य लोगों के बीच क्या फर्क रह जाता? इसमें अपना अनुशासन होना चाहिए।

विस्थापन के नाम पर जो हुआबांधों के नाम पर जो हुआअभ्यारण्योंके नाम पर जो हुआ। सरकार के जो विकास का जो मॉडल है, उस विकास पर अलग-अलग प्लातेफ़ोर्मपर तरह-तरह की चर्चाएँ होती है। जन-सरोकार के विषयों का लेखक होने के नाते आपको येविकास मॉडल कैसा लगता है ?

आप के बातों से ही शुरू करें तो विस्थापन कई कारण से होता है। अभ्यारण्य और नेशनल पार्क से होता है। मेरा कहना है कि एक भी व्यक्ति का विस्थापन नहीं होना चाहिए। उसके लिएसोच बदलने की जरूरत है। बजाय बड़े अधिकारियों को मोटे तनख्वाह देकर जंगलो में भेजने के वहां के स्थनीय लोगों को उसके सुरक्षा में लगाना चाहिए। वहां वे अधिकारी रहना भी नहीं चाहते। वे सिर्फ दौरा करके चले आते है। बल्कि वहां के आदिवासियों कोप्रोटक्शन में लगा देना चाहिए, वहां पर उन लोगों को व्यवसाय देना चाहिए जो वहां रहते है। वहां के लिए बाहर के अधिकारी से बेहतर वहां का स्थानीय आदिवासी काम करसकता है। जहां तक डैम की बात है, तो जो दुनिया में  डैम को लकर बहस चल रही है कि इससे लाभ कम और हानी ज्यादा हुई| इस पर खुले दिमाग से सोचना चाहिए। विकास के मॉडल में जहां तकसंभव हो विस्थापन न हो। ये तो मान के ही चलें कि विस्थापन को न्युनतम रखना है। फिर थोड़ा बहुत होगा तो उनके साथ न्याय किया जा सकता है। लेकिन ये सोच के चलेंगे कि जितनाहो रहा है होने दो और ये सोच रहेगी कि जो हो रहा है, वो विकास के लिए जरूरी है, तो मुश्किल हो जाएगी|

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वर्तमान में आप किन विषयों पर काम कर रहे है ?

इस समय पर मैं विकेंद्रीकरण पर ज्यादा काम कर रहा हूं। और हमारी खेती में इस तरह काविकास कैसे हो, जिससे कि हम अत्मनिर्भरता को, परम्परागत ज्ञान को, परम्परागत बीजों को सहेतने की कोशिश कर सके। इन सब मुद्दों पर काम कर रहा हूं।

लेखक एवं पत्रकार भारत डोगरा से बातचीत करते हिंद वॉच के संपादक सुशील कुमार

आपका व्यक्तिगत जीवन और उसका आपके लेखन पर क्या प्रभव पड़ा ?

मेरी आयु उस समय बीस वर्ष की थी जब मैनं यह निर्णय लिया था कि एक स्वतंत्र लेखक के रूपमें रहूंगा कहीं कोई जॉब नहीं करूंगा। अब मेरी आयु 57 वर्ष है। तो लगभग 37 वर्ष तो मैंने उसको निभा ही लिया। इसमें मुश्किलें तो काफी रहीं, कोई निश्चित वेतन नहीं रहा। पूरे जीवन अनिश्चिंतता बनी रहती है। मेरा पारिवारिक जीवन भी रहा है। इसमें एक तनाव और रहा, पर ऐसा कभी नहीं रहा कि मैं कर्जग्रस्त हो गया हूँ। इस तरह जो स्वतंत्र लेखन करना चाहते है, उन्हें आर्थिक प्लानिंग पहले से कर लेनी चाहिए।दिल्ली जैसे महंगे शहर में कुछ अलग किस्म के जीवन मूल्यों को लेकर जीना और आस-पड़ोस के साथ ताल-मेल बना कर चलना, एक अलग समस्या है। उसको भी हमें अपने स्तर पर सुलझानाहोता है। इसमें कई तरह के खतरों से सामना करना पड़ता है। साथ ही कोई सोशल-सिक्यूरिटीनहीं है। कई बार खतरा प्रभावित इलाकों में भी जाना पड़ता है। कई बार मैं बहुत खतरे की स्थितियों से गुजरा हूँ पर कोई ऐसी विकट परिस्थिति नहीं आई। एक्सिीडेंट तो कई एकबार हुआ। पर मैं ठीक-ठाक हूं। मेरा लेखन निर्बाध चलता रहे, इसके पीछे मेरी पत्नी का बहुत बड़ा हाथ है| वह सहारे की तरह हर मुश्किल समय में मेरे साथ खड़ी रहीं |

लेखन का जो स्टाइल बदला है। जैसे कि चेतन भगत स्टाइल का लेखन आम तौर पर नया लेखने वालोंको फैशिनीटेट करता है। ऐसे में जो युवा लेखक है, पत्रकार या रचनाकार है, उनको आपक्या संदेश देना चाहेंगे ?

एक साधरण सी बात केंद्र में रखें, जहाँ तक दुनियाँ में दुख-दर्द के जो कारण हैं, उनसे कहीं न कहीं जुड़ कर ही रहना चाहिए| उसकी एक समझ बनानी चाहिए, उसी को दूसरे शब्दों में आप सामाजिक सरोकार कह सकते है। लेखन कहीं न कहीं इससे जुड़ करचलना चाहिए। इस प्रकार के लेखन में कहीं न कहीं एक गहरी संतुष्टि मिलती है। जो भी करते है उसमें एक सार्थकता रहती है।


आप किसी पत्रकार संध के सदस्य है
?

मैनें कोई सक्रीय रोल नहीं निभाया है। मैं सदस्य तो हूँ पर जो वर्किंग जर्नलिस्ट होते है, वही सक्रीय रोल निभाते है। मैं तो फ्रीलांसर हूँ |

आपने इतना समय दिया, उसके लिए आपका धन्यवाद !

आपका भी शुक्रिया, नमस्कार

लेखन / प्रस्तुति :

हिंद वॉच मीडिया
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