कुछ सुलझी, कुछ अनसुलझी रह जाती है रिश्तों की कहानी

Rachna Tyagi ARTICLE
रचना त्यागी

प्राय: कोई भी नया संबंध जुड़ने की आरम्भिक अवस्था बहुत रोचक व आकर्षक होता है। धीरे-धीरे यह रोचकता अपने चरम पर पहुँचने के बाद ठिठक जाती है। उसे आगे बढ़ने का स्थान नहीं मिल पाता। शीर्ष के आगे और पीछे, दोनों ओर ढलान होती है। अत: शीर्ष बिंदु पर टिके -टिके रोचकता जब थकान और उकताहट महसूस करने लगती है, वह उदास मन से कदम आगे बढ़ाती है। मानवीय संबंधों के उतार-चढाव को एक अलग नजरिये से देख रहीं हैं रचना त्यागी|


हज़ारों की भीड़ में भी हर व्यक्ति अपनी तरह अकेला है। हर व्यक्तित्व का अपना अलग तापमान है। दुनिया की इस भीड़ में हम अनचाहे कभी जब अपने से तापमान वाले व्यक्तित्व से टकरा जाते हैं तो एक सहज बंध बनना लाज़मी है। ठीक उसी प्रकार, जैसे रसायन-शास्त्र में हर तत्व के मध्य परस्पर रासायनिक बन्ध बनना सम्भव नहीं है, उसके लिए कुछ विशेष भौतिक व रासायनिक गुणों की उपस्थिति अनिवार्य है। यही नियम व्यक्तिगत संबंधों पर भी सटीक बैठता है। रासायनिक बन्ध की भाँति मानवीय बंधों की प्रकृति भी क्षीण अथवा सुदृढ़ होती है, दोनों पक्षों की प्रकृति, गुण व स्वाभाव के आधार पर। आप हर व्यक्ति से एक सा तादात्म्य अनुभव नहीं कर सकते। अब प्रश्न यह उठता है कि इस तादात्म्य और आत्मीयता का स्तर सम्बन्ध की हर सीढ़ी पर एक सा क्यों नहीं रह पाता, जबकि दोनों पक्ष बिल्कुल नहीं बदले हों! प्राय: कोई भी नया संबंध जुड़ने की आरम्भिक अवस्था बहुत रोचक व आकर्षक होता है। धीरे-धीरे यह रोचकता अपने चरम पर पहुँचने के बाद ठिठक जाती है। उसे आगे बढ़ने का स्थान नहीं मिल पाता। शीर्ष के आगे और पीछे, दोनों ओर ढलान होती है। अत: शीर्ष बिंदु पर टिके -टिके रोचकता जब थकान और उकताहट महसूस करने लगती है, वह उदास मन से कदम आगे बढ़ाती है। जो कि रिश्ते को ढलान की ओर ले जाता है। गति चाहे धीमी हो या तीव्र, दिशा पतनोन्मुखी ही रहती है।

कुछ न बदलते हुए भी एक अपरिभाषित नीरवता, अनाकर्षण जगह बनाने लगता है। शायद इसलिए, कि ‘अज्ञात’ का आकर्षण समाप्त हो चुका है। तो यह आकर्षण, यह ख़ुशी , यह उन्माद उस ‘अज्ञात’ के लिए था, जो कि रिश्ते के प्रारम्भ में था, जिसके चलते वह रिश्ता उस समय दुनिया का सबसे ख़ूबसूरत और चिरस्थायी प्रतीत हो रहा था ? जब तक जिज्ञासा बनी रही, रोचकता बनी रही।



हर बार कुछ नया खोजने की, नया पाने की। जहाँ आपने किसीको पूर्णत: खोज लिया, वहीं जिज्ञासा ख़त्म! अब क्या बचा ? और इस जिज्ञासा के पूर्ण होने से लेकर पूरी तरह समाप्त होने के बीच का दौर बहुत भारी प्रतीत होता है। बहुत बोझिल , जैसे कि जल्द से जल्द उसे अपने सिर से उतार फ़ेंकने को मचल रहे हों। ठीक उसके विपरीत , जब आप उसे घड़ी की चौथाई में सिर पर बिठा लेने को आतुर थे। एक-एक पल एक सदी सा लगता था। यह गहरी झील उतरते समय जितनी मनमोहक, रुचिकर और आनंददायी लगती है, वापसी में उतनी ही उबाऊ। और तब हम कई पड़ावों पर रुककर सुस्ताते हैं , पीछे मुड़-मुड़कर देखते हैं कि शायद आनंद की लहर एक बार फिर आकर हमें छू जाये। पर नहीं! यह समय की लहर है, जो एक बार हमे छूकर गुज़र गयी तो दोबारा नहीं आती।




उस समय हम विश्लेषण करने बैठते हैं … रिश्ते का, अपनी कही-सुनी बातों का, व्यवहार का, अपनी और दूसरे की कमियों का। और तब ‘अज्ञात’ की शक्ति का बोध होता है। इस ‘अज्ञात’ तत्व की अनुपस्थिति में कुछ और समय तक संबंध जोड़े रखने का दायित्व बड़ी सहजता से ‘आदत’ अपने ऊपर ले लेती है। पर वह भी कुछ समय तक ही इसका निर्वहन कर पाती है, केवल उस स्थिति में, जबकि दोनों सिरों ने उसे मज़बूती से थामा हो। एक पक्ष की पकड़ कमज़ोर पड़ते ही वह भी रिश्ता जोड़े रखने में असमर्थ हो जाती है। यही है मानवीय संबंधों की पहेली , जो अनसुलझी रहकर ही आश्चर्यजनक रूप से रिश्ते के स्थायित्व का आधार बनती है



लेखन / प्रस्तुति :

रचना त्यागी
रचना त्यागी
रचना त्यागी स्वतंत्र लेखिका हैं| वे हिंद वॉच मीडिया के लिए नियमित रूप से लिखती रहीं हैं| हिंद वॉच मीडिया जमीनी सरोकारों से जुड़ी जनपक्षधरता की पत्रकारिता कर रही है| समूह अपने साप्ताहिक अखबार, न्यूज़ पोर्टल, वेब चैनल और सोशल मीडिया नेटवर्क के माध्यम से जमीनी और वास्तविक ख़बरों को निष्पक्षता के साथ अपने पाठकों तक पहुंचाती है| भारत और विदेशों में यह वेब पोर्टल पढ़ा जा रहा है|
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