पर्यावरण की रक्षा के लिए ईमानदार पहल की जरुरत

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सुशील कुमार

पिछले दिनों दिल्ली सरकार ऑड-ईवन की वजह से खासी सुर्ख़ियों में रही| जहाँ एक ओर सरकार ने इसे प्रदूषण कम करने का कारगर तरिका बताया, वहीँ विपक्ष ने इसे महज़ पब्लिसिटी स्टंट करार दिया| इसमें कोई शक नहीं कि पहले चरण के मुकाबले दुसरे चरण में ऑड-ईवन इतना कारगर साबित नहीं हो पाया| समीक्षा के नाम पर तेज गर्मी या स्कूलों के खुले होने को इसके लिए जिम्मेवार ठहराया गया लेकिन सोचने की बात यह है कि पर्यावरण को बचाने के लिए ऑड-ईवन जैसे किसी शोर्ट-कट की जगह क्या किसी विशेष योजना पर काम करने की जरुरत नहीं है?  

दिल्ली में प्रदूषण को लेकर दिल्ली सरकार नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल को रिपोर्ट देने में नाकाम रही है| मामले की सुनवाई के दौरान जब कोर्ट में दिल्ली सरकार की ओर से कोई वकील पेश नहीं हुआ तब एनजीटी ने घोर नाराजगी जताई| एनजीटी  ने कहा कि हर बार रिपोर्ट देने के बजाय क्यों सरकार 1-2  हफ्ते का समय मांग लेतीdelhi-odd-even-759 है? सरकार ऑड-इवन को लेकर जितनी सक्रिय रही है, उतना दिल्ली में कूड़ा जलाने, धूल की समस्या और 10-15  साल पुरानी डीजल और पेट्रोल की गाड़ियों से होने वाले प्रदूषण को रोकने के लिए अब तक सक्रिय क्यों नहीं दिखी है? NGT इस पर कई गंभीर आदेश पास कर चुका है| एनजीटी ने सरकार को आदेश दिया कि ऑड-इवन से 10 दिन पहले, उसके दौरान और फिलहाल प्रदूषण की स्थिति को लेकर रिपोर्ट NGT को दे| ये रिपोर्ट दिल्ली सरकार और सेंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड को देनी थी, लेकिन जब दोनों रिपोर्ट NGT को नहीं दे पाए, तब एनजीटी ने कठोर शब्दों में जाराजगी व्यक्त किया|


सोशल मीडिया में दिल्ली सरकार पर उस समय कई सवाल उठाए गए जब केजरीवाल सरकार के संस्कृति मंत्री
 कपिल मिश्रा आर्ट ऑफ़ लिविंग के विवादित कार्यक्रम वर्ल्ड कल्चर फेस्टिवल के स्वागत समिति (रिसेप्शन कमेटी) के सदस्य बनें|  फेसबुक पर लोगों में पोस्ट लिखकर जानना चाहा कि8-copy कपिल मिश्रा किस हैसियत से वर्ल्ड कल्चर फेस्टिवल के स्वागत समिति (रिसेप्शन कमेटी) के सदस्य बनें? दिल्ली सरकार के मंत्री होने के नाते या व्यक्तिगत तौर पर? यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण हो गया क्यूंकि उन्होंने अपने लेटर पैड पर दिल्ली के मंत्री होने के नाते एक चिट्ठी लिखकर केन्द्रीय रक्षा मंत्री मनोहर पार्रिकर को अनुरोध किया था कि सेना ने कार्यक्रम के लिए जो एक पुल बनाया है, वह नाकाफी है, इसलिए कृप्या एक और पौन्टून पुल बनाने की कृपा की जाए|
एनडीटीवी ने एक बहस में आप नेता संजय सिंह सेर पूछा की कहीं ये “कॉन्फ्लिक्ट ऑफ़ इंटरेस्ट” के दायरे में तो नहीं आता है
?  यह सवाल अपने आप में बेमानी नहीं है कि पर्यावरण के नाम पर सतर्क दिखने वाली सरकार एक तरफ ऑड-इवन पर बहुत मुस्तैद है तो दूसरी तरफ यमुना के साथ खिलवाड़ करने वाले बाबा के कारनामों को मौन समर्थन देती है। अगर सच में सरकार को पर्यावरण की चिंता है तो यमुना किनारे हुए पर्यावरण नियमों के उलंघन और हवाओं में घुलते जहर के लिए अलग-अलग पैमाने क्यों?

जानकार यह भी बताते हैं कि दिल्ली में हवाओं में बढ़ते प्रदूषण के लिए प्राइवेट गाड़ियों का योगदान लगभग दस फीसदी ही है| ऐसे में अन्य उपायों पर भी ध्यान देना होगा जिससे प्राइवेट गाड़ियों के अलावा प्रदूषण फैलाने वाले कारकों पर लगाम लगाया जा सके| दिल्ली के आस-पास बड़े पैमाने पर बिल्डिंग कन्स्ट्रक्शन हो रहा है और दुसरे राज्यों में चल रहीं विभिन्न औद्योगिक इकाईयों से भी दिल्ली की आबोहवा दूषित होती है| जब तक किसी विशेष एक्शन प्लान पर काम नहीं किया जाएगा तब तक दिल्ली की हवा में घुलते जहर से निपटा नहीं जा सकेगा| ऐसा लगता है कि दिल्ली सरकार अब किसी विशेष योजना पर गंभीरता से विचार कर रही है, यही कारण है कि मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल नेऑड-ईवन के दुसरे चरण की समाप्ति के बाद छत्रसाल स्टेडियम में दिल्ली सरकार द्वारा आयोजित धन्यवाद समारोह में यह स्वीकार किया कि सिर्फ ऑड-इवन से बात बनने वाली नहीं है| दिल्ली को प्रदूषण और जाम से मुक्ति दिलाने के लिए सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था को भी ठीक करना होगा। उन्होंने अगले एक साल तक दिल्ली में ऑड-इवन फार्मूला लागू नहीं करने की भी बात कही| मुख्यमंत्री की यह घोषणा स्वागत योग्य है| 




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लेखन / प्रस्तुति :

सुशील कुमार
सुशील कुमार
लेखक हिंद वॉच मीडिया समूह के संपादक हैं| हिंद वॉच मीडिया जमीनी सरोकारों से जुड़ी जनपक्षधरता की पत्रकारिता कर रही है| समूह अपने साप्ताहिक अखबार, न्यूज़ पोर्टल और सोशल मीडिया नेटवर्क के माध्यम से जमीनी और वास्तविक ख़बरों को निष्पक्षता के साथ अपने पाठकों तक पहुंचाती है| भारत और विदेशों में यह वेब पोर्टल पढ़ा जा रहा है|
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