(लागत नहीं मिल पाने पर सड़क पर आलू फेंकने को मजबूर बाराबंकी के आलू किसान)
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त्तर प्रदेश के बाराबंकी में किसानों ने अपना आलू सड़क पर फेंक दिया, जिसे लोगों ने लूटा, जानवरों ने खाया, फिर भी चारों ओर आलू सड़ रहा है। असल में नये आलू की अच्छी फसल हुई है जबकि अकेले बाराबंकी जिले के कोल्ड स्टोरेज में 30 हजार बोरा आलू पिछले साल का पड़ा है। बाजार में नया आलू बामुश्किल 150 से 200 रुपये क्विंटल यानी डेढ से दो रुपये किलो बिक रहा है, जबकि कोल्ड स्टोरेज से माल निकाल कर केवल परिवहन करने का व्यय तीन सौ रूपए क्विंटल पड़ रहा है। किसान मांग कर रहे हैं कि आलू की खरीदी का समर्थन मूल्य कम से कम लागत के अनुसार रू. 487 हो। उधर रही बची कसर पूरी तब हो गई जब पंजाब से आलू की खेप उ.प्र के अलावा राज्य के माल की खपत वाले दिल्ली जैसे इलाकों में आने लगी। किसान की अपनी लगात तो दूर उसे उखाड़ कर मंडी तक लाने का खर्च भी पूरा करना भारी पड़ रहा है।

विदित हो किसान 50-55 किलोग्राम आलू का एक बोरा बनाता है। इसको कोल्ड स्टोरेज में रखने का किराया 90 से 110 रुपया तक होता है। खाली बोरी 17 या 18 रुपये में मिलती है । सुतली, पल्लेदारी, ट्रैक्टर का किराया आदि मिलाकर 25 रुपये और खर्च होते हैं। अभी आलू 80 से 90 रुपये में एक बोरा व्यापारी खरीद रहे हैं। इससे कोल्ड स्टोरेज का किराया ही नहीं निकल रहा है। किराया की बची रकम और बोरी के दाम के साथ मालिकों से लिया गया लोन किसानों पर चढ़ा हुआ है। अब यह कोल्ड स्टोरेज मालिक किसानों के लोन के खाते में डालकर अगले वर्ष वसूलेंगे। आलू की आर्थिकी किसान को घाटे में डालने के साथ कर्ज को बढ़ाने वाली बन चुकी है। किसान अपने खेत की मिट्टी भी बेचता है तो आलू उत्पादन की स्थिति से बेहतर हालात होते हैं।

मध्य प्रदेश के नीमच में यही हाल प्याज का हो रहा है। गत दो सप्ताह से वहां मंडी में कई ढेरी की तो नीलामी ही नहीं हो पा रही है। अब मंडी में माल खरीदी के इंतजार के लिए दो-तीन दिन षहर में ठहरना किसान को महंगा पड़ रहा है, उतना पैसा तो उसे प्याज बेचने पर नहीं मिल रहा। दिसंबर महीने के पहले दिन वहां सामान्य प्याज की कीमत पचास पैसे किलो मिल रही थी। हताश किसान अपना माल वैसा ही मंडी में छोड़ कर चला गया। रतलाम जिले की सैलाना मंडी में प्याज, लहसुन और मटर की इतनी आवक हुई कि ना तो खरीदार मिल रहे और न ही मंडी में माल रखने की जगह। राजस्थान के झालावाड़ में लहसुन का उत्पादन कोई 27 हजार एकड़ में होता है। वहां फसल तो बहुत बढ़िया हुई लेकिन माल को इतने कम दाम पर खरीदा जा रहा है कि लहसून की झार से ज्यादा आंसू उसके दाम सुन कर आ रहे हैं। मुल्ताई में में कोई 6400 एकड़ में किसानों ने पत्ता गोभी बोई और उसकी शानदार फसल भी हुई लेकिन बाजार में उसका खरीदार 40 से 50 पैसे प्रति किलो से अधिक देने को राजी नहीं। इतने में तो उसकी केवल फसल कटाई का व्यय नहीं निकलेगा। इलाके के किसानों ने रोटावेटर मंगवाए हैंं ताकि पत्ता गोभी को वहीं काट कर मिट्टी में मिलया जा सके।

यह हाल इन दिनों पूरे देश में है, कहीं टमाटर तो कहीं मिर्ची की शानदार फसल लागत भी निकाल पा रही है।। वहीं दिल्ली-मुंबई महानगर तो ठीक ही है, भोपोल, जबलपुर, कानपूर, जैसे शहरों में ये सब्जियां मंडी की खरीदी के दाम से चार सौ गुना तक दाम में उपभोक्ता को मिल रही हैं।

भारत के सकल घरेलू उत्पाद का 31.8 प्रतिशत खेती-बाड़ी में तल्लीन कोई 64 फीसदी लोगों के पसीने से पैदा होता है । दुखद कि देश की अर्थ व्यवस्था की रीढ़ कहलाने वाली खेती के विकास के नाम पर बुनियादी सामाजिक सुधारों को लगातार नजरअंदाज किया जाता रहा है । पूरी तरह प्रकृति की कृपा पर निर्भर किसान के श्रम की सुरक्षा पर कभी गंभीरता से सोचा ही नहीं गया । फसल बीमा की कई योजनाएं बनीं, उनका प्रचार हुआ, पर हकीकत में किसान यथावत ठगा जाता रहा- कभी नकली दवा या खाद के फेर में तो कभी मौसम के हाथों । किसान जब ‘‘कैश क्रॉप’’ यानी फल-सब्जी आदि की ओर जाता है तो आढ़तियों और बिचौलियों के हाथों उसे लुटना पड़ता है।

देश के अलग-अलग हिस्सों में कभी टमाटर तो कभी अंगूर, कभी मूंगफली तो कभी गोभी किसानों को ऐसे ही हताश करती है। राजस्थान के सिरोही जिले में जब टमाटर मारा-मारा घूमता है तभी वहां से कुछ किलोमीटर दूर गुजरात में लाल टमाटर के दाम ग्राहकों को लाल किए रहते हैं। दिल्ली से सटे पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई जिलों में आए साल आलू की टनों फसल बगैर उखाड़े, मवेशियों को चराने की घटनाएं सुनाई देती हैं। आश्चर्य इस बात का होता है कि जब हताश किसान अपने ही हाथों अपनी मेहनत को चौपट करता होता है, ऐसे में गाजियाबाद, नोएडा, या दिल्ली में आलू के दाम पहले की ही तरह तने दिखते हैं। राजस्थान, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, और उप्र के कोई दर्जनभर जिलों में गन्ने की खड़ी फसल जलाने की घटनांए हर दूसरे-तीसरे साल होती रहती है। जब गन्ने की पैदावार उम्दा होती है तो तब शुगर मिलें या तो गन्ना खरीद पर रोक लगा देती हैं या फिर दाम बहुत नीचा देती हैं, वह भी उधारी पर। ऐसे में गन्ना काट कर खरीदी केंद्र तक ढो कर ले जाना, फिर घूस दे कर पर्चा बनवाना और उसके बाद भुगतान के लिए दो-तीन साल चक्कर लगाना; किसान को घाटे का सौदा दिखता है। अतः वह खड़ी फसल जला कर अपने दुर्भाग्य है कि संकर बीज , खाद-दवा बेचने वाली कंपनियां शानदार फसल का लोभ दिखा कर अपने उत्पपाद किसान को बेच देती हैं। चूंकि किसान को प्रबंधन की सलाह देने वाला कोई होता नहीं, सो वे प्रचार के फेर में फंस कर एक सरीखी फसल उगा लेते हैं। वे न तो अपने गोदाम में रखे माल को बेचना जानते हैं और न ही मंडियां उनके हितों की संरक्षक होती हैं। किसी भी इलाके में स्थानीय उत्पाद के अनुरूप् प्रसंस्करणो उद्योग हैं नहीं। जाहिर है कि लहलहाती फसल किसान के चैहरे पर मुस्कान नहीं ला पाती।

कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था वाले देश में कृषि उत्पाद के न्यूनतम मूल्य, उत्पाद खरीदी, बिचौलियों की भूमिका, किसान को भंडारण का हक, फसल-प्रबंधन जैसे मुद्दे, गौण दिखते हैं सब्जी, फल और दूसरी कैश-क्राप को बगैर सोचे-समझे प्रोत्साहित करने के दुश्परिणाम दाल, तेल-बीजों(तिलहनों) और अन्य खाद्य पदार्थों के उत्पादन में संकट की सीमा तक कमी के रूप में सामने आ रहे हैं। आज जरूरत है कि खेतों में कौन सी फसल और कितनी उगाई जाए, पैदा फसल का एक-एक कतरा श्रम का सही मूल्यांकन करे; इसकी नीतियां तालुका या जनपद स्तर पर ही बनें। कोल्ड स्टोरेज या वेअर हाउस पर किसान का कब्जा हो, साथ ही प्रसंस्करण के कारखाने छोटी-छोटी जगहों पर लगें।

आज आलू किसानों को कर्ज से दबने से बचाने के लिए सरकारी संस्थाओं को पहले वेयर हाउस में रखा माल न्यूनतम मूल्य पर खरीद कर उसे राशन की दुकानों या मिड-डे-मील या इन दिनों समुद्री तूफान से अस्त-व्यस्त केसल जैसे राज्यों मे बतौर राहत भेजने जैसी योजनाओं में तत्काल खपाने पर विचार करना चाहिए। नष्ट होती फसल केवल पैसे का अपव्यय ही नहीं है, यह श्रम, प्रकृति और देख में हर दिन भूखे सो रहे लाखों लोगों का अपमान भी है।