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भारतीय संविधान के निर्माता और दलित उत्थान के पितृपुरुष बाबासाहब भीमराव आंबेडकर की जन्मभूमि महू में जातिवाद से जुड़ा एक अनोखा मामला सामने आया है। महू के एडवांस टेक्निकल कॉलेज में 17 दिसंबर को एक प्रोफेसर विक्रम सिंह ठाकुर ने एक छात्र के लिए जातिसूचक शब्द का इस्तेमाल किया। प्रोफेसर द्वारा जातिसूचक शब्द के इस्तेमाल करने पर छात्रों ने विरोध किया और पुलिस में शिकायत दर्ज कराई। लेकिन बाद में छात्र नेता प्रोफेसर ठाकुर के खिलाफ शिकायत इस शर्त पर वापस लेने के तैयार हो गए कि वो बाबासाहब आंबेडकर की जन्मस्थली पर जाकर उनकी प्रतिमा के सामने कान पकड़कर माफी मांगेगे। छात्रों ने प्रोफेसर ठाकुर से बाबसाहब आंबेडकर की प्रतिमा के सामने भविष्य में ऐसी हरकत न करने की शपथ भी दिलवाई।

आंबेडकर अनुसूचित जातियों को दलित कहने पर जोर देते थे। वो महात्मा गांधी द्वारा दलितों को “हरिजन” कहे जाने के विरोधी थे। आंबेडकर का मानना था कि दलित कहे जाने से अनुसूचित जातियों को उन पर हुए अत्याचार और नाइंसाफी का अहसास होता है।

भारतीय संविधान के अनुसार अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के लोगों के लिए जाति सूचक शब्द का प्रयोग दंडनीय अपराध है। एससी-एसटी के तहत आने वाली जातियों के लिए जाति सूचक शब्दों के प्रयोग पर प्रतिबंध है। ये कानून एससी-एसटी एक्ट के नाम से जाना जाता है।