Print Friendly, PDF & Email

गुरमीत राम रहीम को मिली सजा असल में अधर्म पर संविधान की जीत है| क्योंकि अगर देश में संविधान का राज नहीं होता तो अरबों की संपत्ति के मालिक और राजनीतिक रसूख वाला राम रहीम जेल की सलाखों के पीछे नहीं गया होगा| मैं तो यही सोच रहा हूं कि जब देश का संविधान नहीं बना था और यह देश मनुस्मृति के हिसाब से चलता था तो यहां क्या होता होगा?

फिर देश की गरीब और बहुसंख्यक आबादी को ‘भगवान के भक्त’ और ‘भगवान के दूत’ किस तरह कुचलते होंगे| केरल का इतिहास आपके सामने है| वहां की निम्न वर्ग की महिलाओं को शरीर का ऊपरी भाग ढकने का अधिकार नहीं था| आप सोचिए कि किसी औरत के लिए यह कितने शर्मिंदगी की बात रहती होगी| दक्षिण में देवदासी प्रथा की प्रथा की आहट गाहे-बिगाहे अब भी सुनाई देती रहती है| लेकिन बाबासाहेब के बनाए संविधान ने और आईपीसी बनाने वाले लार्ड मैकाले की दखल होने के बाद इन कुप्रथाओं पर काफी हद तक रोक लगी है|

हालांकि घोड़ी पर नहीं चढ़ने देना, मंदिर में नहीं घुसने देना, चारपाई पर बैठने पर मारपीट करने जैसी घटनाएं ढलते मनुवाद की ही निशानी है| लेकिन देश का कानून और संविधान अब वंचित तबके को संबल देने लगा है| संविधान और कानून की बदौलत ही गरीब से गरीब आदमी किसी भी ताकतवर इंसान से टकरा जाने की हिम्मत रखता है| जैसा की राम रहीम के विरोध में दो साध्वियां आई| और संविधान और कानून की मदद से उसके नर्क का साम्राज्य खत्म कर दिया| उम्मीद है कि कानून और अदलात की मदद से राम रहीम के डेरा सच्चा सौदा में कैद अन्य लड़कियों को भी जल्दी ही मुक्ति मिल जाएगी|

साभार : दलित दस्तक

 





SHARE
पिछली खबरसिलेबस में मनमाना बदलाव वर्ण व्यवस्था को फिर से लागू करने की साजिश है
अगली खबर पाकिस्तान और नेपाल हैं भारत से ज्यादा खुशहाल देश : द वर्ल्ड हैप्पीनेस रिपोर्ट 2017
बुद्ध भूमि बिहार के छपरा जिले के मूलनिवासी अशोक दास ने गोपालगंज कॉलेज से राजनीतिक विज्ञान में स्नातक (आनर्स) करने के बाद सन् 2005-06 में देश के सर्वोच्च मीडिया संस्थान ‘भारतीय जनसंचार संस्थान, जेएनयू कैंपस दिल्ली’ (IIMC) से पत्रकारिता में डिप्लोमा किया है। 2006 से मीडिया में सक्रिय हैं। लोकमत, अमर उजाला, भड़ास4मीडिया और देशोन्नति (नागपुर) जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में काम कर चुके हैं। उन्होंने पांच साल तक कांग्रेस, भाजपा सहित तमाम राजनीतिक दलों, विभिन्न मंत्रालयों और पार्लियामेंट की रिपोर्टिंग की। वे ‘दलित दस्तक‘ मासिक पत्रिका के संस्थापक एवं संपादक हैं। मई 2012 से लगातार पत्रिका वंचितों की आवाज को मुखरता से उठा रही है| अशोक दास द्वारा शुरू की गयी दलित दस्तक पत्रिका का जून 2017 में वेब चैनल (www.youtube.com/c/dalitdastak) के रूप में विस्तार हुआ है, जिसे बहुत तेजी से लोकप्रियता मिली है| अशोक हिंद वॉच मीडिया के संपादक मंडल के सदस्य हैं| हिंद वॉच मीडिया जमीनी सरोकारों से जुड़ी जनपक्षधरता की पत्रकारिता कर रहा है| साप्ताहिक अखबार, न्यूज़ पोर्टल, वेब चैनल और सोशल मीडिया नेटवर्क के माध्यम से जमीनी और वास्तविक ख़बरों को निष्पक्षता और निडरता के साथ अपने पाठकों तक पहुंचाने के लिए हिंद वॉच मीडिया पूरी समर्पण से काम करता है| भारत और विदेशों में यह वेब पोर्टल पढ़ा जा रहा है|