Saturday, February 23, 2019
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संपादकीय

    Editorial by Sushil Swatantra

    आसान नहीं है बद्री नारायण लाल हो जाना

    कम्युनिष्ट पार्टी के इतिहास में 21 मई 2017 कभी नहीं भुल पाने वाली वह तारीख है, जब साम्यवादी आन्दोलन का एक चमचमाता लाल सितारा...

    कौन बनाता है भारतीय मुसलामानों को संदिग्ध ?

    "जेंटलमैन, ब्लड ईज थिकर दैन वाटर " ⇒ मोहम्मद अली जिन्ना नेहरु और जिन्ना ने तो अपने स्वार्थ के कारण मुल्क को दो टुकड़ों में...

    नोटबंदी के दौरान हुई मौतों का हिसाब किसके पास है ?

    आज दो महत्वपूर्ण आरटीआई का जिक्र करना इसलिए जरुरी है क्यूंकि देश 72वें स्वतंत्रता दिवस का जश्न मनाने जा रहा है। यह कोई मामूली...

    न्यूजरूम के तनाव से हो रही खबरनवीसों की मौतों से मालिक...

    मालिक की पूंजी का पेट मुनाफे से ही भरता है, इसलिए अखबार को हल हाल में छपना होता है। चाहे आतंकवादियों की गोली हो...

    दस बड़े कारण जिसने भारत में वामपंथ को कमजोर किया

    साम्यवाद का काबा माना जाने वाला सोवियत संघ जब भरभराकर ढ़ह गया, तब यह कहा गया कि विश्व की पूंजीवादी शक्तियों ने पूरी ताकत...

    प्रधानमंत्री की चुप्पी से संदिग्ध होता जा रहा है राफेल डील...

    राफेल विमान सौदा केंद्र सरकार और खासकर प्रधानमंत्री की निजी छवि के लिए घातक सिद्ध होता जा रहा है। इसमें कोई शक नहीं है...

    संपादक मंडल

       सुशील स्वतंत्र संपादक      समानता के अधिकार और लोकतंत्र में गहरी आस्था रखने वाले सुशील एक निर्भीक पत्रकार होने के साथ-साथ प्रगतिशील युवा कवि और सामाजिक कार्यकर्ता भी हैं| उन्होंने...

    सरकार बुधनी की मौत पर लीपापोती न करती तो बच सकती...

    प्रधानमंत्री जी अपने सपनों के जिस भारत के निर्माण की दिशा में अग्रसर हैं, उसे उन्होंने ‘न्यू इंडिया’ का नाम दिया है, यानी एक...

    युद्ध स्मारकों को जातीय चश्में से न देखा जाए

    नया साल हर तीन सौ पैंसठ दिनों के बाद आ जाता है लेकिन 2018 के पहले दिन को हम इस लिहाज से अलग कह...