Saturday, January 19, 2019

खूँटियों पर टँगे दिन (कविता)- अनूप अशेष

खूँटियों पर टँगे दिन फटती कमीजों से रहे धूल पीती साँस टूटे घरों का संत्रास, आँवे के नीचे रहे ज्यों किसी का रहवास मोटे लिबासों बीच पतली समीजों-से रहे। बड़े घर की ओट...

इतवार और तानाशाह (कविता)- मणि मोहन

आज इतवार है अपने घर पर होगा तानाशाह एकदम अकेला... क्या कर रहा होगा ? गमलों में लगे फूलों को डाँट रहा होगा ! हाथों में कैंची लिए लताओं के पर...

युद्ध के मालिक (कविता)- बॉब डिलन

आओ युद्ध के मालिकों तुमने ही बनाईं सारी बंदूकें तुमने ही बनाए मौत के सारे हवाई जहाज तुमने बम बनाए तुम जो दीवारों के पीछे छिपते हो छिपते फिरते...

आकाश से गोलियों की बौछार (कविता)- बोरीस स्‍कीस्‍लूत्‍

आकाश से गोलियों की बौछार की तरह तालुओं को जला रही है वोदका आँखों से टपकते हैं तारे जैसे गिर रहे हों बादलों के बीच से और...

मार्खेज को डिमेंशिया हो गया है (कविता)- अंशु मालवीय

मार्खेज को डिमेंशिया हो गया है। जीवन की उत्ताल तरंगों के बीच गिर-गिर पड़ते हैं स्मृति की नौका से बिछल-बिछलकर; फिर भरसक-भरजाँगर कोशिश कर बमुश्किल तमाम चढ़ पाते हैं...

हमारी बेटियाँ (कविता) : आकांक्षा यादव

हमारी बेटियाँ घर को सहेजती-समेटती एक-एक चीज का हिसाब रखतीं मम्मी की दवा तो पापा का आफिस भैया का स्कूल और न जाने क्या-क्या। इन सबके बीच तलाशती हैं अपना भी वजूद बिखेरती...

अश्लीलता, आत्मा की (कविता)- आंद्रेइ वोज्नेसेन्स्की 

अपने नग्न प्रशंसक के साथ नाच रही है सबके सामने प्रेमिका। खुश हो ले, ओ शरीर की अश्लीलता कि आत्मा भी प्रदर्शित करती है अपनी अश्लीलता! कला जगत...

मापदंड बदलो (कविता)- दुष्यंत कुमार

मेरी प्रगति या अगति का यह मापदंड बदलो तुम, जुए के पत्ते-सा मैं अभी अनिश्चित हूँ । मुझ पर हर ओर से चोटें पड़ रही हैं, कोपलें उग रही...

एक औरत का चेहरा (कविता)- अडोनिस

मैं एक औरत के चेहरे में रहता हूँ जो एक लहर में रहता है जिसे उछाल दिया है ज्वार ने उस किनारे पर खो दिया है जिसने...

नाँव मंत्री के अब रटींला हम (कविता)- बेढब बनारसी

नाँव जेकर बहुत जपींला हम ऊ त गुमनाम हौ सुनींला हम शिव क, दुर्गा क पाठ का होई नाँव मंत्री क अब रटींला हम जब से देखलीं ह...