Tuesday, May 21, 2019

विलुप्त हो रहे प्राणी (कविता)- आंद्रेइ वोज्नेसेन्स्की

विलुप्त हो रहे सभी प्राणियों का विवरण लिख दिया गया है मेरी श्वेत पुस्तिका में। चिंताजनक हैं ये कुछ लक्षण कि पहले तो वर्ष भर के लिए फिर...

कोलकाता लघु पुस्तक मेला में कविता उत्सव का आयोजन किया गया

कोलकाता, रविन्द्र अकोकुरा भवन परिसर में आयोजित लिटिल मैगजीन मेले में मरुतृण साहित्य पत्रिका, सदीनामा साहित्य पत्रिका, साहित्य त्रिवेणी साहित्य पत्रिका एवं विनिर्माण (बंगला)...

मीडिया विमर्श (कविता)- मंगलेश डबराल

उन दिनों जब देश में एक नई तरह का बँटवारा हो रहा था काला और काला और सफेद और सफेद हो रहा था एक तरफ लोग...

हम लड़ेंगे साथी : पाश

हम लड़ेंगे साथी, उदास मौसम के लिए हम लड़ेंगे साथी, ग़ुलाम इच्छाओं के लिए हम चुनेंगे साथी, ज़िन्दगी के टुकड़े हथौड़ा अब भी चलता है, उदास निहाई...

हमारी अर्थी शाही हो नहीं सकती (कविता)- अनुज लुगुन

हमारे सपनों में रहा है एक जोड़ी बैल से हल जोतते हुए खेतों के सम्मान को बनाए रखना हमारे सपनों में रहा है कोइल नदी के किनारे एक...

टैगोर और अंधी औरतें (कविता)- बोधिसत्व

बरस रहा था देर से पानी भीगने से बचने के लिए मैं रुका था दक्षिण कलकत्ता में एक पेड़ के नीचे, वहीं आए पानी से बचते-बचाते परिमलेंदु बाबू। परिमलेंदु बाबू टैगोर...

मैं बेटी हूँ (बाल कविता)- जितेश कुमार

मम्मी कहती बिटिया रानी, तू घर की है चुनरी धानी। दुबकी गोद में लेटी हूँ, पापा की मैं बेटी हूँ। खूब चहकती घर के अंदर, धमाचौकड़ी घर में दर-दर। ए...

सौ-सौ चीते (कविता)- अजय पाठक

बची हुई साँसों पर आगे जाने क्या कुछ बीते एक हिरण पर सौ-सौ चीते। चलें कहाँ तक, राह रोकती सर्वत्र नाकामी कहर मचाती, यहाँ-वहाँ तक फैली सुनामी नीलकंठ हो गए जगत...

घास की पुस्तक (कविता)- अर्सेनी तर्कोव्‍स्‍की

अरे नहीं, मैं नगर नहीं हूँ नदी किनारे कोई क्रेमलिन लिये मैं तो नगर का राजचिह्न हूँ।   राजचिह्न भी नहीं मैं उसके ऊपर अंकित तारा मात्र हूँ, रात...

आकाश से गोलियों की बौछार (कविता)- बोरीस स्‍कीस्‍लूत्‍

आकाश से गोलियों की बौछार की तरह तालुओं को जला रही है वोदका आँखों से टपकते हैं तारे जैसे गिर रहे हों बादलों के बीच से और...