Tuesday, May 21, 2019

सबै जात गोपाल की -(नाटक)- भारतेंदु हरिश्चंद्र

(एक पंडित जी और एक क्षत्री आते हैं) क्षत्री : महाराज देखिये बड़ा अंधेर हो गया कि ब्राह्मणों ने व्यवस्था दे दी कि कायस्थ भी...

क्रांतिकारी की कथा (व्यंग्य) : हरिशंकर परसाई

‘क्रांतिकारी’ उसने उपनाम रखा था। खूब पढ़ा-लिखा युवक। स्वस्थ, सुंदर। नौकरी भी अच्छी। विद्रोही। मार्क्स-लेनिन के उद्धरण देता, चे-ग्वेवारा का खास भक्त। कॉफी हाउस में...

कहानी: कितने पाकिस्तान- कमलेश्वर -भाग 1

कितना लम्बा सफर है! और यह भी समझ नहीं आता कि यह पाकिस्तान बार-बार आड़े क्यों आता रहा है। सलीमा! मैंने कुछ बिगाड़ा तो...

मापदंड बदलो (कविता)- दुष्यंत कुमार

मेरी प्रगति या अगति का यह मापदंड बदलो तुम, जुए के पत्ते-सा मैं अभी अनिश्चित हूँ । मुझ पर हर ओर से चोटें पड़ रही हैं, कोपलें उग रही...

मर्द और औरत (नाटक)- रशीद जहाँ

औरत - अरे फिर आ गये! मर्द - जी हाँ औरत - अभी कल ही तो आप शादी करने गये थे! मर्द - गया तो था! औरत -...

कोलकाता लघु पुस्तक मेला में कविता उत्सव का आयोजन किया गया

कोलकाता, रविन्द्र अकोकुरा भवन परिसर में आयोजित लिटिल मैगजीन मेले में मरुतृण साहित्य पत्रिका, सदीनामा साहित्य पत्रिका, साहित्य त्रिवेणी साहित्य पत्रिका एवं विनिर्माण (बंगला)...

चिकित्सा का चक्कर (व्यंग्य)- बेढब बनारसी

मैं बिलकुल हट्टा-कट्टा हूँ। देखने में मुझे कोई भला आदमी रोगी नहीं कह सकता। पर मेरी कहानी किसी भारतीय विधवा से कम करुण नहीं...

कुछ सुलझी, कुछ अनसुलझी रह जाती है रिश्तों की कहानी

प्राय: कोई भी नया संबंध जुड़ने की आरम्भिक अवस्था बहुत रोचक व आकर्षक होता है। धीरे-धीरे यह रोचकता अपने चरम पर पहुँचने के बाद...

देश-द्रोह (कहानी)- पांडेय बेचन शर्मा उग्र

17 नवंबर, सन 1845 ई. की बात है। मारे सर्दी के निशा-सुंदरी काँप रही थी, और काँप रहा था उसी के साथ संपूर्ण पंजाब-प्रदेश।...

मार्केट वैल्यू (कविता)- अनवर सुहैल

जो है जैसा भी है ग्राह्य नही किसी को... दिखे नहीं सो बिके नहीं अब बिके नहीं तो कौन पुछवैया... चाल बदलकर, ढाल बदलकर घड़ी-घड़ी में भेष बदलकर चकमा देने वाले...