Print Friendly, PDF & Email

झारखंड में खनिज संपदा से जुड़े कार्यों में कोयला खनन और विपणन एक प्रमुख कारोबार है। यहाँ विभिन्न कोलयरियों में एक लाख से भी अधिक कोयलाकर्मी खनन और प्रबंधन के काम में कार्यरत हैं। राज्य के सात लोकसभा क्षेत्र ऐसे हैं जहाँ कोयलाकर्मी निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं। चुनाव की दृष्टि से गिरिडीह, धनबाद, दुमका, रांची, हजारीबाग पलामू और चतरा सीटों पर कोयलाकर्मियों की भूमिका अहम मानी जाती है। कोयलांचल के सभी कोलफील्ड क्षेत्रों में लेबर यूनियन की सक्रियता से काम करते हैं और वामपंथी पार्टियों खासकर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की स्थिति मजबूत रही है।

झारखंड के कोयलांचल क्षेत्र में कोयला मजदूरों के अधिकारों की रक्षा के लिए आंदोलनों का लंबा इतिहास रहा है। यहाँ  सभी बड़े सेन्ट्रल ट्रेड यूनियनें जैसे एटक, इंटक, सीटू, बीएमएस और एचएमएस मजदूरों को संगठित करने का काम कर रहीं हैं। एटक से सम्बद्ध यूनाइटेड कोल वर्कर्स यूनियन कोयलाकर्मियों का एक प्रमुख यूनियन है। वर्तमान में भी कोयलाकर्मियों के जिन मांगों को लेकर लडाई जारी है उनमें प्रमुख कोयला क्षेत्र में श्रम का निजीकरण, कमर्शियल माइनिंग, आउटसोर्सिंग, अनुकंपा के आधार पर परिजनों को नौकरी एवं कोयलाकर्मियों की सुरक्षा से जुड़े मुद्दे हैं।

यह ऐतिहासिक तथ्य है कि कुछ बूथों पर नक्सलियों के चुनाव बहिष्कार की धोषणा के बावजूद इन क्षेत्रों के कोयलाकर्मी बहुत सक्रियता के साथ चुनावी प्रक्रिया में हिस्सा लेते आए हैं। इस क्षेत्र से भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के विधायक और सांसद चुनाव जीतते रहे हैं। कई केंद्र और राज्य सरकारों के मंत्री कोयलांचल क्षेत्र से चुनाव जीतते रहे है, जिन्होंने वित्त मंत्री, विदेश मंत्री, नागरिक उड्डयन राज्यमंत्री, वित्त राज्यमंत्री और राज्य सरकार के मंत्री के रूप में अनेक महत्वपूर्ण कार्यभार सम्भाला है।

सवाल यह उठता है कि कमरतोड़ मेहनत करने वाले कोयलाकर्मी अपने वोट और सपोर्ट से जिन जन प्रतिनिधियों को चुनकर संसद में भेजते हैं, क्या वे कोयलाकर्मियों के मुद्दों को ईमानदारी से संसद में उठाते हैं? अधिकतर कोयलाकर्मी यह मानते हैं कि उनके जनप्रतिनिधियों ने अबतक सिर्फ उनके साथ छलावा किया है। अगर कोयलाकर्मियों की मांगों को संसद में दमदार आवाज़ के साथ उठाया जाता तो उनकी समस्याएं जस-की-तस नहीं बनी होती। लगभग सभी कोलफील्ड परियोजनाओं में नई नौकरियों का सृजन नहीं हो रहा है और प्रबंधन ठेकेदारी पर अस्थायी मजदूरों से काम ले रहा है। स्थायी नौकरी कोयला क्षेत्र के लिए अब पुरानी बात हो चली है। कोयले के खनन से लेकर ढुलाई तक सब ठेकेदारी मजदूरों से करवाए जा रहे हैं। सरकार ने कोयले के व्यावसायिक खनन (कमर्शियल माइनिंग) की इजाज़त दे दी है, जिसने सरकारी कम्पनियों के साथ-साथ गैर-सरकारी माइनिंग कम्पनियों द्वारा खनन का रास्ता साफ़ कर दिया है। श्रम कानूनों में लगातार मजदूर विरोधी बदलाव किये जा रहे हैं। ठेकेदारी पर काम करने वाले मजदूर खनन कम्पनियों के पे-रोल पर नहीं होते हैं बल्कि उन्हें पसीना बहाकर कमाए हुए मेहनताने के लिए ठेकेदार के रहमोकरम पर निर्भर रहना होता है। ऐसा होने से अनुबंधित कोयला मजदूरों के सामने सामाजिक असुरक्षा और कभी भी नौकरी छिनने का खतरा बना रहता है। ठेकेदारी में अनुकंपा के आधार पर परिजनों मिलने वाली नौकरी का कोई सवाल ही नहीं उठता है। पहले सेवानिवृत होने वाले या मेडिकल तौर पर काम करने के लिए अयोग्य घोषित कर दिए गए कोयलाकर्मी के उत्तराधिकारी को कोयला क्षेत्र में नौकरी मिल जाया करती थी लेकिन निजीकरण और ठेकेदारी के नए दौर में ऐसी नौकरियों के अवसर खत्म हो गये हैं।

चार प्रमुख पब्लिक सेक्टर कोल कम्पनियों में तीन के मुख्यालय झारखंड में हैं। सेंट्रल कोलफील्ड्स लिमिटेड (सीसीएल) और सेंट्रल माइन प्लानिंग एंड डिजाइनिंग इंस्टिट्यूट लिमिटेड (सीएमपीडीआई) के मुख्यालय राजधानी रांची में हैं।  भारत कोकिंग कोल लिमिटेड (बीसीसीएल) का मुख्यालय झारखंड के प्रमुख शहर धनबाद में है और चौथी कम्पनी  ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (ईसीएल) का मुख्यालय वर्धमान (पश्चिमी बंगाल) में है। इस कोल कम्पनियों में एक लाख से ज्यादा कोयलाकर्मी कार्यरत हैं।

झारखंड में कार्यरत कोयलाकर्मियों की संख्या
क्रम सं. कोल कम्पनी का नाम कोयलाकर्मियों की संख्या
01. सेंट्रल कोलफील्ड्स लिमिटेड (सीसीएल) 40681
02. सेंट्रल माइन प्लानिंग एंड डिजाइनिंग इंस्टिट्यूट लिमिटेड (सीएमपीडीआई) 3384
03. भारत कोकिंग कोल लिमिटेड (बीसीसीएल) 48513
04. ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (ईसीएल) 5500

 

कोयलाकर्मियों की इतनी बड़ी संख्या और कोयला कम्पनियों के मुख्यालयों का झारखंड और आस-पास होने के बावजूद कोयला मजदूरों की आवाज संसद से सड़क तक अनसुनी कर दी जाती है। आज भी कोयला काटने और ढोने वाले मजदूरों को उस दिन का इन्तजार है जब उनके वोट से जीतने वाले जनप्रतिनिधि उनके दर्द को संसद तक पहुंचायेंगें। वे सात सांसद जो उन लोकसभा क्षेत्रों से जीतते हैं जहाँ कोयलाकर्मियों का वोट निर्णायक होता है, अगर पूरी ईमानदारी से कोयलाकर्मियों के मुद्दे को उठायेंगें तो निश्चय ही कोयला मजदूरों की बुझी आँखों में चमक आ सकती है।

अब जब लोकतंत्र का महापर्व सामने है कोयलाकर्मियों के लिए भी एक अवसर है कि अपने लोकसभा क्षेत्र से सबसे बेहतर और मजदूर हितैषी उम्मीदवार को वोट करके संसद तक भेजें, जो इनकी आवाज़ की नुमाईंदगी देश के सबसे बड़े पंचायत में कर सकें। इस मोड़ पर मजदूरों में राजनैतिक चेतना जगाने और उन्हें लामबंद करने में ट्रेड यूनियनों की भूमिका बहुत अहम हो जाती है, हालाँकि यह भी एक दिलचस्प सत्य है कि एक जमाने में लाल झंडे का ताकतवर गढ़ माने जाने वाले   झारखंड के कोयलांचल क्षेत्र में आज सिर्फ एक सीट पर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी चुनाव लड़ पा रही है।





SHARE
पिछली खबरभाजपा ने पहली लिस्ट में काटा 6 सांसदों का टिकट
अगली खबर गधम् शरणम् गच्छामि (व्यंग्य)
पत्रकार, लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता सुशील, समानता और लोकतंत्र में गहरी आस्था रखते हैं। अनेक प्रतिष्ठित पत्र–पत्रिकाओं एवं साहित्यिक ई–पोर्टल्स में उनकी कविताएँ, आलेख और लघुकथाएँ प्रकाशित हो चुकी है। ग्रास-रूट जर्नलिज्म (ज़मीनी पत्रकारिता) उनके काम की विशेषता है। लेखन के साथ–साथ सामाजिक–सांस्कृतिक क्षेत्र में भी वे बेहद सक्रिय हैं। उन्होंने लम्बे समय तक एच.आई.वी./एड्स जागरूकता और बचाव के लिए उच्य जोखिम समूह के साथ काम किया है। वे असंगठित कामगारों के अधिकारों के लिए भी संघर्षशील हैं। सुशील हिंद वॉच मीडिया समूह के संपादक हैं।