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सत्येन्द्र प्रकाश / संतोष यादव
जी हां! हम जिस गीता की बात करने जा रहे हैं, वह वही जाना-पहचाना ग्रन्थ श्रीमद्भागवत गीता है, लेकिन अपने नए सरल, सुगम, सुग्राह्य रूप में। इसके रचयिता या कहें रूपांतरकार सुल्तानपुर (उत्तर प्रदेश) के शिवनगर(बाबू गंज) निवासी बैंक कर्मी गंगा प्रसाद यादव ‘आत्रेय’ हैं। अवधी का स्पर्श लिए हुए हिंदी के दोहा छंद में लिखी गई इस पुस्तक (गीता) के प्रस्तुत संस्करण में गेयता भी है। आखिर इसकी प्रेरणा कहां से मिली के जवाब में लेखन और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में रुचि रखने वाले समाजसेवी गंगा प्रसाद का कहना है कि बात 16 अप्रैल, 2012 की है वे ऋषिकेश स्थित गीता भवन में श्रीमद्भागवत पर चल रहे सत्संग/प्रवचन में हिस्सा ले रहे थे, तभी इनके मन में विचार उठा कि वे पद्य(दोहे) में अनुवाद करके गीता के उपदेशों को आमजन तक पहुंचाएंगे। इसके बाद भी बहुत समय तक ऊहापोह में रहे लेकिन पुत्र-पुत्री समेत परिनों, मित्रों का उत्साहवर्धन रंग लाया और आत्रेय की कलम चल पड़ी। और 18 अप्रैल के उषा काल से शुरू करके उन्होंने मात्र तीन महीने में जुलाई, 2012 तक अठारह अध्याय के अंतर्गत 121 दोहों की रचना कर डाली।

हाल ही में उनकी हिंदी-गीता (दोहे में) पुस्तक का रूप ले चुकी है। इसके सम्भवतः प्रथम पाठक रहे, जिले के संत तुलसीदास पीजी कॉलेज के हिंदी विभागाध्यक्ष पर से अवकाश प्राप्त प्रोफेसर और कवि डॉ. ओंकारनाथ द्विवेदी ने इसे दोहे में लिखी जाने वाली पहली गीता होने का दावा किया है। उनका कहना है कि गीता के पहले अनुवाद (मानस के तर्ज पर दोहा-चौपाई), जिसे डॉ. हरिवंशराय बच्चन ने लिखा था, को छोड़कर, दोहा छंद में यह पहली रचना है। हालांकि, इस दावे को प्रामाणिक मानने की कोई पुख्ता वजह नहीं है। क्योंकि विंध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी ने पूरे जोरावर सिंह, रायबरेली के ओम प्रकाश की रचना बताकर गीता के कुछ श्लोकों को दोहे के रूप में पेश किया है।

दो पदी (दोहे से मिलते-जुलते) छंद में गीता भाष्य की कुछ पंक्तियां दूसरे नामों से भी देखी गईं हैं। लेकिन सच यह भी है कि उस रचनाकार ने पूरी गीता का पुस्तकाकार अनुवाद पूरा किया है कि नहीं, यह उधृत पंक्तियों या उनके संदर्भ से स्प्ष्ट नहीं होता। खैर, उपलब्ध अनूदित गीता के लिए गंगा प्रसाद की न केवल सराहना की जानी चाहिए, अपितु इस गेय गीता के लिए की गई श्रम-साधना के नाते वे साधुवाद के पात्र भी हैं। जिन्होंने अभी तक इस विशालकाय श्रीमद्भागवत गीता को, अच्छी टीकाएं मौजूद होने के बावजूद न पढ़ा हो, या पढ़ने का अवसर न मिला हो उन्हें गीता के गूढ़ ज्ञान को आसानी से समझने के लिए इसे ज़रूर पढ़ना चाहिए। आशा है, यह गीता का संदेश आप तक पहुंचाने में सफल होगी।