आग सब कुछ नहीं जला पाती…

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बहरहाल, समय बहुत ताकतवर है| इतना ताकतवर कि एक तरफ यह महरम बनकर पीड़ितों के जख्म भर रहा है, तो दूसरी तरफ गुजरात दंगों के बाद जिस नरेन्द्र मोदी को अमेरिका का वीजा लेना मुश्किल हो गया था, उन्हें आज कैपिटल हिल में अमेरिकी कांग्रेस के संयुक्त सत्र को संबोधित करने का सुअवसर दे रहा है|
14 साल पुराना नरसंहार, जिसे गुलबर्ग सोसायटी हत्याकांड के नाम से जाना गया, 2002 में गुजरात में हुए दंगों के सर्वाधिक चर्चित मामलों में एक था| इस हत्याकांड में पूर्व सांसद एहसान जाफरी समेत 69 लोगों को जला कर मार दिया गया था। अनेक सामाजिक कार्यकर्ता और पूर्व सांसद एहसान जाफरी की विधवा जकिया जाफरी इस कत्ल-ए-आम के शिकार लोगों के लिए इन्साफ की लड़ाई लड़ी| आखिरकार 14 साल की लम्बी कानूनी लडाई के बाद 24 आरोपियों को दोषी करार दिया। इनमें 11 पर हत्या का अभियोग सिद्ध हुआ। बाकी इससे कम संगीन जुर्म के दोषी पाए गए। लेकिन अहम बात यह है कि 36 आरोपियों को सबूत के आभाव में बरी कर दिया गया।
यह बहस गर्म हो चली है कि आखिर गुलबर्ग मामले में 36 आरोपी क्यों छूट गए? फिलहाल, अनुमान यही है कि अभियोग पक्ष उनके खिलाफ पर्याप्त साक्ष्य जुटाने में विफल रहा। जाकिया जाफरी ने जब सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की थी, उसमें 2002 दंगों और गुलबर्ग हत्याकांड के लिए राज्य के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को भी 62 लोगों के साथ जिम्मेदार ठहराया गया था। सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर एसआईटी ने याचिका में उठाए गए मुद्दों की जांच की, एसआईटी ने 2010 में नरेंद्र मोदी से भी लंबी पूछताछ की। हालांकि मोदी ने इस बात से साफ इंकार किया था कि 28 फरवरी 2002 के दिन एहसान जाफरी की तरफ से उन्हें मदद के लिए फोन आया था| पूरी जांच के बाद एसआईटी की तरफ से इस मामले में अदालत में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल की गई, जिसे 26 दिसंबर 2013 को अदालत ने मंजूर कर लिया। आखिरकार इस मामले में फाइल चार्जशीट में कुल 68 लोगों के नाम शामिल किए गए, जिसमें से चार नाबालिग और 66 वयस्क थे।
gulbargगुलबर्ग सोसायटी का मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि दायर किए गए मुकदमें में 62 लोगों में तत्कालीन मुख्यमंत्री का भी नाम दोषियों की फेहरिस्त में शामिल किया गया था| और दूसरी वजह यह है कि भीड़ द्वारा किए गए क़त्ल-ए-आम के मामले में यह एक ऐसा केस है, जिसमें अपराध सिद्ध हुए हैं। वरना, अपने देश में ऐसी वारदातों में न्याय होने का रिकॉर्ड बेहद कमजोर रहा है। 1984 के सिख विरोधी दंगे, अयोध्या में विवादित ढांचे के ध्वंस के बाद 1992-93 में हुए अनेक दंगे और उसके पहले की सांप्रदायिक हिंसा की अनगिनत घटनाएं इस बात की मिसाल हैं। एक तरफ तो इसे भारतीय न्याय व्यवस्था में होने वाले सकारात्मक बदलाव की तरह देखा जा रहा है, तो वहीं दूसरी तरफ इस मामले ने अनेक सफेदपोशों के दामन के दाग पर पड़ी वक्त की गर्त को झाड दिया है|
बहरहाल, समय बहुत ताकतवर है| इतना ताकतवर कि एक तरफ यह महरम बनकर पीड़ितों के जख्म भर रहा है, तो दूसरी तरफ गुजरात दंगों के बाद जिस नरेन्द्र मोदी को अमेरिका का वीजा लेना मुश्किल हो गया था, उन्हें आज कैपिटल हिल में अमेरिकी कांग्रेस के संयुक्त सत्र को संबोधित करने का सुअवसर दे रहा है| लेकिन जब 14 साल तक न्याय की आस लिए कानूनी लडाई लड़ने वाली गुजरात दंगे का शिकार हुए पूर्व सांसद एहसान जाफरी की विधवा यह कहतीं हैं कि ‘यह आधा न्याय है और मैं पूरा न्याय मिलने तक मैं संघर्ष करूँगीं’, तब लगता है कि नफरत की आग सब कुछ नहीं जला सकती| कम से कम न्याय पाने के लिए पीड़ितों के अन्दर के जज्बे को तो बिलकुल भी नहीं|





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पत्रकार, लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता सुशील, समानता और लोकतंत्र में गहरी आस्था रखते हैं। अनेक प्रतिष्ठित पत्र–पत्रिकाओं एवं साहित्यिक ई–पोर्टल्स में उनकी कविताएँ, आलेख और लघुकथाएँ प्रकाशित हो चुकी है। ग्रास-रूट जर्नलिज्म (ज़मीनी पत्रकारिता) उनके काम की विशेषता है। लेखन के साथ–साथ सामाजिक–सांस्कृतिक क्षेत्र में भी वे बेहद सक्रिय हैं। उन्होंने लम्बे समय तक एच.आई.वी./एड्स जागरूकता और बचाव के लिए उच्य जोखिम समूह के साथ काम किया है। वे असंगठित कामगारों के अधिकारों के लिए भी संघर्षशील हैं। सुशील हिंद वॉच मीडिया समूह के संपादक हैं।
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