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हम देखेंगे
लाज़िम है कि हम भी देखेंगे
वो दिन कि जिसका वादा है
जो लोह-ए-अज़ल [1] में लिखा है
जब ज़ुल्म-ओ-सितम के कोह-ए-गरां [2]
रुई की तरह उड़ जाएँगे
हम महक़ूमों के पाँव तले
ये धरती धड़-धड़ धड़केगी
और अहल-ए-हक़म के सर ऊपर
जब बिजली कड़-कड़ कड़केगी
जब अर्ज-ए-ख़ुदा के काबे से
सब बुत उठवाए जाएँगे
हम अहल-ए-सफ़ा, मरदूद-ए-हरम [3]
मसनद पे बिठाए जाएँगे
सब ताज उछाले जाएँगे
सब तख़्त गिराए जाएँगे

बस नाम रहेगा अल्लाह का
जो ग़ायब भी है हाज़िर भी
जो मंज़र भी है नाज़िर[4] भी
उट्ठेगा अन-अल-हक़ का नारा
जो मैं भी हूँ और तुम भी हो
और राज़ करेगी ख़ल्क-ए-ख़ुदा
जो मैं भी हूँ और तुम भी हो

शब्दार्थ
1. सनातन पन्ना
2. घने पहाड़
3. पवित्रता या ईश्वर से वियोग
4. देखने वाला

इक़बाल बानो की दिलकश आवाज़ में इस नज़्म को नीचे दिए वीडियो लिंक को क्लिक करके सुना जा सकता है :

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ का नाम उर्दू की दुनिया बड़े अदब के साथ लिया जाता है। 13 फरवरी 1911 अविभाजित हिदुस्‍तान के शहर सियालकोट (पंजाब) में, जो अब पाकिस्तान में है, उनका जन्म हुआ। सन् 1936 में वे प्रेमचंद, मौलवी अब्‍दुल हक़, सज्‍जाद जहीर और मुल्‍क राज आनंद द्वारा स्‍थापित प्रगतिशील लेखक संघ में शामिल हुए। फै़ज़ अहमद फै़ज़ बाबा मलंग साहिब,लाहौर के सूफी,अशफाक अहमद,सयेद फखरुद्दीन बल्ली,वासिफ अली वासिफ और अन्य सूफी संतों से बेहद प्रभावित होते हुए भी एक प्रतिबद्ध मार्क्सवादी थे। आधुनिक उर्दू शायरी को उन्होंने एक नई ऊँचाई दी। वे अंग्रेजी तथा अरबी में एम०ए० करने के बावजूद भी कवितायें उर्दू में ही लिखते थे। 1942 से लेकर 1947 तक वे ब्रिटिश-सेना मे कर्नल रहे । फिर फौ़ज़ से अलग होकर ’पाकिस्‍तान टाइम्‍स’ और ’इमरोज़’ अखबारों के एडीटर रहे। लियाकत अली खाँ की सरकार के तख्तापलट की साजिश रचने के जुर्म में वे 1951‍-1955 तक कैद में रहे । इसी दौरान लिखी गई कविताएँ बाद में बहुत लोकप्रिय हुईं, जो “दस्ते सबा” तथा “जिंदानामा” में प्रकाशित हुईं । बाद में वे 1962 तक लाहौर में पाकिस्तान आर्टस काउनसिल मे रहे। 1963 में उनको सोवियत-संघ (रूस) ने लेनिन शांति पुरस्कार प्रदान किया। भारत के साथ 1965 के युद्ध के समये वे पाकिस्तान के सूचना मंत्रालय मे काम कर रहे थे। 1984 में, उनके देहांत से पहले, उनका नाम नोबेल पुरस्कार के लिये प्रस्तावित किया गया था।