(प्रतीकात्मक तस्वीर)
Print Friendly, PDF & Email

झारखंड में निजी स्कूलों की इसलिए मनमानी चलती है क्यूंकि यहाँ फीसवृद्धि पर नियंत्रण के लिए किसी तरह का कोई कानून नहीं है। राज्य सरकार ने इस संबंध में कानून बनाने की पहल तो की है लेकिन यह विधानसभा की प्रवर समिति के पास लंबित है। प्राइवेट विद्यालयों में मनमाने ढंग से लगातार हो रहे फीसवृद्धि से एक तरफ जहाँ अविभावक परेशान हैं तो दूसरी तरफ सरकार लाचार क्यूंकि राज्य के पास फीसवृद्धि पर नियंत्रण के लिए अन्य राज्यों की तरह कोई कानून नहीं है। प्राइवेट विद्यालयों द्वारा इस स्थिति का जमकर फायदा उठाया जा रहा है।

वैसे तो देश भर के निजी स्कूलों में फीस वृद्धि समस्या है। इससे निपटने के लिए अलग-अलग राज्यों ने सख्त कानून बनाए हैं। इसके तहत जुर्माना, प्रिंसिपल को हटाने, स्कूल की मान्यता रद्द करने और तीन साल जेल सजा का प्रावधान है। तमिलनाडु ने सबसे कठोर फीस एक्ट बनाया है। एक्ट के उल्लंघन पर तीन से सात साल तक की सजा का प्रावधान है।

15 से 20 प्रतिशत तक की फीस वृद्धि : उदाहरण के लिए जमशेदपुर शहर को ही लीजिये जहां निजी स्कूलों ने इस वर्ष 15 से 20 प्रतिशत की फीस वृद्धि की है। यह फीस वृद्धि प्रतिवर्ष हो रही है। इसका सीधा असर अभिभावकों के पॉकेट पर पड़ रहा है। राज्य के सिर्फ एक शहर जमशेदपुर में 60 प्रमुख निजी स्कूल हैं। इनमें नर्सरी से 12वीं कक्षा तक लगभग 1.50 लाख विद्यार्थी पढ़ते हैं।

झारखंड से बहुत बेहतर है दूसरे राज्यों में फीसवृद्धि नियंत्रण कानून :
आईये एक नज़र दुसरे राज्यों में निजी विद्यालयों की मनमानी रोकने के लिए बनाए गए राज्यों में फीसवृद्धि नियंत्रण कानूनों पर एक नज़र डालते हैं :

आंध्र प्रदेश : 2009 में एक्ट पारित किया गया। इसके तहत नामांकन फार्म की कीमत 100 रुपये और रजिस्ट्रेशन फीस 5 सौ से ज्यादा नहीं होनी चाहिए। विद्यार्थियों की ट्यूशन फीस, शिक्षकों की सैलरी के आधार पर तय होगी।

तमिलनाडु : 2009 में फीस एक्ट पास किया गया। इसके तहत हाईकोर्ट के पूर्व जज के नेतृत्व में बनी कमेटी प्रति वर्ष फीस वृद्धि तय करती है। नियम पालन नहीं करने पर तीन से सात साल तक जेल का प्रावधान है।

महाराष्ट्र : 2011 में फीसवृद्धि के लिए नियम के उल्लंघन पर अधिकतम 10 लाख जुर्माना और प्रिंसिपल को हटाने का प्रावधान है।

उत्तरप्रदेश : यूपी स्ववित्तपोषित स्वतंत्र विद्यालय (शुल्क का निर्धारण) अध्यादेश-2018 को हाल ही में राज्यपाल की मंजूरी मिली है जिसमें यह प्रावधान है कि निजी स्कूल अब न तो मनमानी फीस वसूल सकेंगे और न ही पांच साल से पहले यूनिफॉर्म बदल सकेंगे। इसके दायरे में 20 हजार रुपये से अधिक सालाना फीस लेने वाले सभी स्कूल आएंगे।इस अध्यादेश के प्रावधान प्रदेश में संचालित हो रहे बेसिक शिक्षा परिषद, माध्यमिक शिक्षा परिषद, केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा परिषद, भारतीय माध्यमिक शिक्षा परिषद समेत सभी शिक्षा बोर्डों पर लागू होंगे। अल्पसंख्यक संस्थान भी इसके दायरे में आएंगे। स्कूल किसी खास दुकान से किताबें व यूनिफॉर्म खरीदने को बाध्य नहीं कर सकेंगे। अध्यादेश के अनुसार निजी स्कूल वार्षिक फीस में 5 फीसदी से अधिक वृद्धि नहीं कर सकेंगे। अन्य मदों को भी मिला दें तो अधिकतम वृद्धि 7-8 फीसदी ही कर सकेंगे। फीस स्ट्रक्चर अनिवार्य रूप से वेबसाइट पर प्रदर्शित करना होगा। एडमिशन फीस सिर्फ एक बार ही वसूल सकेंगे। मनमानी करने वाले स्कूल प्रबंधन पर पहली बार एक लाख रुपये, दूसरी बार 5 लाख रुपये जुर्माना लगाया जाएगा। तीसरी बार में मान्यता रद्द कर दी जाएगी।

गुजरात : 2017 में बने फीस रेग्यूलेशन एक्ट के उल्लंधन पर पांच से 10 लाख तक जुर्माना। 15 दिनों में जुर्माना नहीं भरा तो एक प्रतिशत जुर्माना बढ़ेगा। मान्यता रद्द करने का भी प्रावधान ।

मध्यप्रदेश : 10 प्रतिशत से ज्यादा फीस नहीं बढ़ा सकते। साथ ही नियम तोड़ने पर दो से चार लाख तक का जुर्माना। वहीं, मान्यता रद्द करने का प्रावधान।

इनके अलावा अन्य राज्यों ने भी निजी विद्यालयों में फीसवृद्धि रोकने के लिए कानून बनाया है लेकिन झारखंड इस मामले में फिसड्डी साबित हो रहा है क्यूंकि यहाँ अभी तक फीसवृद्धि पर नियंत्रण वाला कानून विधानसभा की प्रवर समिति के पास लंबित है।