Print Friendly, PDF & Email

बाबाओं के सम्मोहन के विषय में बात करते हुए आप अगर ओशो रजनीश को भूल रहे हैं तो आप सबसे बड़ी भूल कर रहे हैं, वर्तमान बाबा बाजार का जहरीला मॉडल देने वाले इन बाबाजी को बार बार समझना होगा ताकि इस बीमारी का ठीक निदान किया जा सके| ओशो पर बात करते हुए अक्सर ही यह मान लिया जाता है कि चूँकि वे बुद्ध से सबसे ज्यादा प्रभावित थे इसलिए उनकी शिक्षाएं बुद्ध या बौद्ध दर्शन के अनुकूल हैं| यह भी मान लिया जाता है कि चूँकि उन्होंने कई बार अंबेडकर और दलितों का पक्ष लेते हुए महात्मा गांधी और हिन्दू धर्म सहित वर्ण व्यवस्था पर चोट की है इसलिए वे अंबेडकर की शिक्षाओं के पक्ष में हैं| इस आलेख में संजय जोठे कह रहे हैं कि मैं इन दोनों मान्यताओं को नकारना चाहता हूँ|

शो न तो पूरी तरह से अंबेडकर के पक्ष में हैं न ही बुद्ध या बौद्ध दर्शन के पक्ष में हैं| वे इन दोनों का ब्राह्मणीकरण कर रहे हैं और बुद्ध के मुंह से वह सब निकलवा रहे हैं जो बुद्ध के मूल दर्शन में कहीं है ही नहीं| यह बात अंबेडकरवादियों और दलितों सहित भारत के आदिवासियों, शूद्रों, पिछड़ों और स्त्रीयों को साफ़ साफ़ समझ लेनी चाहिए| इस तथ्य को उजागर करना इस किताब का एक बड़ा उद्देश्य है|

असल में प्रारंभिक दौर में ओशो ने जो नास्तिकवादी और तर्कवादी दिशा ली थी उसकी असफलता के बाद उन्होंने तय किया कि वे भारत की अन्धविश्वासी जनता को उसके अंधविश्वास के जरिये ही पकड़ेंगे और स्वयं को स्वीकृत बनायेंगे| उस समय उन्हें न केवल स्वयं को स्वीकृत बनाने की आवश्यकता थी बल्कि उन्हें धन संपत्ति और संसाधन जुटाने की भी आवश्यकता थी| इसलिए उन्होंने गहराई से निरीक्षण करके पाया कि आम भारतीय अन्धविश्वासी और धर्मभीरु मनुष्य किस बात से प्रभावित होता है और किस बात से उत्तेजित होता है| इन दोनों का एकसाथ उपयोग करते हुए उन्होंने ब्राह्मणवादी मान्यताओं पर खड़े धर्म और साधना का प्रचार शुरू किया| इसी दौर में उन्होंने नव संन्यास की घोषणा की इसके बाद उनकी प्रसिद्धि बढती ही गयी और वे शीघ्र ही एक सम्पन्न आश्रम में रहने लगे| लेकिन ब्राह्मणवाद को उपयोग करते हुए वे यह भूल रहे थे कि जिस खेल को वे शुरू कर रहे हैं वो खेल वे खुद ही कभी बंद नहीं कर सकेंगे|

धार्मिक अंधविश्वास पर खड़ी कोई भी रचना दुर्निवार होती है| ब्राह्मणवाद इतना जहरीला खेल है कि इसका उपयोग करने वाले को भले ही यह लगता हो कि वो इसका उपयोग कर रहा है लेकिन अंत में जाहिर होता है कि ब्राह्मणवाद ही उस व्यक्ति को निगलकर उपयोग करने लगता है| ठीक यही ओशो के साथ हो रहा है| उनके शिष्यों की आजकल की शिक्षाओं को देखिये और उनके आश्रमों को देखिये| यह बहुत साफ़ हो जाता है कि ब्राह्मणवादी खेल का उपयोग करने के बाद ओशो कभी ब्राह्मणवाद के चंगुल से आजाद नहीं हो सके और इसी खींचतान में उनका अंत हुआ| उनकी अंतिम किताब में वे ब्राह्मणी अर्थ के या वेदान्तिक अर्थ के पुनर्जन्म को प्रचारित करते हुए विदा हो रहे हैं|
इससे साफ़ जाहिर हो रहा है कि बुद्ध की प्रशंसा और अनत्ता की प्रशंसा करते हुए भी वे अनत्ता के आधार पर रचे गये पुनर्जन्म के निषेध को अपने “सबसे विद्रोही” शिष्यों के सामने अपने अंतिम प्रवचनों में भी नहीं रख पा रहे हैं| इसका क्या अर्थ है? इसका अर्थ यही हुआ कि या तो वे वेदान्तिक पुनर्जन्म को ही सत्य मानते हैं, या फिर बुद्ध की प्रशंसा करते हुए भी वे बुद्ध के मुंह से वेदांत की प्रशंसा करवाना चाह रहे हैं| दोनों स्थितियों में वे बुद्ध और अंबेडकर के खिलाफ जा रहे हैं और उस सनातनी पाखण्ड का प्रदर्शन कर रहे हैं जिसमे “सर्वम खल्विदं ब्रह्मं” अर्थात सब कुछ ब्रह्म ही है – कहने वाले आदिशंकराचार्य एक चांडाल के स्पर्श कर जाने पर कुपित हो जाते हैं| कण कण में ब्रह्म का दर्शन करने की सलाह और भेदभाव छुआछूत एकसाथ चलाए रखना, यही सनातनी पाखण्ड है यही ब्राह्मणवाद का सबसे खतरनाक अस्त्र है| ऊपर ऊपर समावेश और प्रगतिशीलता की प्रशंसा चलती है लेकिन सामाजिक व्यवस्था और सामाजिक व्यवहार में एक इंच का भी बदलाव नहीं आने दिया जाता सामाजिक व्यवस्था जहां की तहां एक पर्वत सी अचल बनी रहती है|
इस लेख से गुजरते हुए सभी पाठक मित्रों से निवेदन है कि वे एक बात को बहुत साफ़ तौर से समझ लें और नोट कर लें| भगवान् रजनीश पर भारत का सबसे बड़ा ब्राह्मणवादी गुरु होने का जो आरोप यहाँ लगाया जा रहा है उसका यह अर्थ नहीं है कि भगवान् रजनीश पुरातनपंथी या रुढ़िवादी विचारक या गुरु हैं| न ही इसका यह अर्थ है कि वे प्राचीन भारतीय दर्शन और समाज व्यवस्था को बनाये रखने का सचेतन प्रयास कर रहे हैं| इसके विपरीत वे बहुत प्रगतिशील विचारों वाले, बहुत खुले और दुस्साहसिक वैचारिक प्रयोग करने वाले व्यक्ति हैं जिन्होंने कई मौकों पर पुरानी व्यवस्थाओं को चुनौती दी है और पश्चिम में हुई सफल क्रांतियों की शिक्षाओं को कई कई तरह से बतलाने का प्रयास किया है|

इसके बावजूद वे कुछ ख़ास अर्थों में भयानक रूप से ब्राह्मणवादी हैं और उनका इस तरह का ब्राह्मणवाद किसी जाहिर और घोषित रूप से काम करने वाले ब्राह्मणवाद से अधिक खतरनाक है, क्योंकि यह प्रगतिशील और क्रांतिकारी चर्चाओं के पीछे छिपकर काम करता है| न केवल सिद्धांत में ऐसा है बल्कि यह जमीनी तौर पर उनके विशाल शिष्य समुदाय में उनकी दिनचर्या और उनकी दार्शनिक, धार्मिक, रहस्यवादी और सामाजिक मान्यताओं में साफ़ देखा जा सकता है| यह बात जटिल है इसलिए इसे बिन्दुवार समझना औचित होगा:

  1. भगवान रजनीश घोषित रूप से स्त्री स्वतंत्रता के पक्ष में हैं और स्त्री को वैचारिक, सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और यहाँ तक कि लैंगिक आजादी देने के भी पक्ष में हैं| लेकिन यह बात उनकी मुख्या प्रस्तावना में शामिल नहीं है| जिस रहस्यवाद या धर्म दर्शन को वे प्रचारित कर रहे हैं और जिस वेदान्तिक ढाँचे के आधार पर वे पुनर्जन्म और मोक्ष की धारणा का प्रचार कर रहे हैं वह ढांचा और वे धारणाएं ऐतिहासिक रूप से पुरुष सत्ता और पितृ-सत्ता को ही मदद करती आई हैं|
    उदाहरण के लिए वे गीता की व्याख्या करते हुए कृष्ण द्वारा दिए गए वक्तव्य को दोहराते हैं “स्त्रीयों में मैं कीर्ति हूँ” इस कीर्ति की व्याख्या करते हुए वे इसे एक विशिष्ठ गुण बताते हैं और इसे संवेदनशीलता और स्त्रैणता से जोड़ते हैं जो स्त्री को एक ख़ास तरह के ढाँचे में जकड़कर देखने जैसा है| यह मान लिया गया है कि स्त्री स्त्रैण ही होगी, नाजुक और संवेदनशील होना ही उसका आत्यंतिक गुण है| इस तरह की चर्चाओं का समाज पर जो प्रभाव है और रुढ़िवादी हिन्दू समाज इसे जिस भाँती स्वीकार करता है उसे अब ध्यान से देखिये| वह समाज जब स्त्री पुरुष की समानता और स्त्री अधिकारों की बातों के साथ साथ कीर्ति की इस तरह की व्याख्या सुनता है तब असल में उसकी स्मृति में क्या गहराई से रजिस्टर होता है? निश्चित ही उसके मन में आर्थिक या लैंगिक आजादी की प्रस्तावना की बजाय कीर्ति की व्याख्या ही अधिक गहराई से अंकित होगी| लेकिन जब लोग कीर्ति की व्याख्या से प्रभावित होकर भगवान् रजनीश का गुणगान करेंगे तब कई लोग गलती से यह मान लेंगे कि यह गुणगान उस व्यक्ति का है जिसने स्त्री की परिपूर्ण स्वतंत्रता की प्रस्तावना दी है|
  2. इसी तरह जब वे अंबेडकर की प्रशंसा करते हुए दलितों आदिवासियों या शूद्रों (ओबीसी) के अधिकारों को समर्थन दे रहे हैं तब वे बहुत क्रांतिकारी नजर आते हैं लेकिन असल में विचार की दृष्टि से क्रांतिकारी बनते हुए भी वे सामाजिक सस्थाओं के सन्दर्भ में जब वर्ण व्यवस्था पर टिप्पणी करते हैं तो वे वर्ण व्यवस्था के “क्रियात्मक तर्क (फंक्शनल लोजिक) का पूरी तरह समर्थन करते हैं और इसे कार्य विभाजन की ही एक पद्धति बताकर महिमामंडित करते हैं| गीता की व्याख्या करते हुए वे कृष्ण द्वारा चार वर्णों के सृजन को इसी तर्क से समझाते और वैध ठहराते हैं| इसके बाद भी उनके बाद के प्रवचनों में वे जोर देकर कहते हैं कि पैदा तो सभी शुद्र होते हैं कोई कोई अपने पुरुषार्थ से ब्राह्मण बन पाता है| इस बिंदु को सावधानी से समझना होगा| जब वे इस प्रकार का वक्तव्य दे रहे हैं तो असल में वे वर्ण व्यवस्था को मान्यता दे रहे हैं भले ही वे इसे जन्म के आधार पर नहीं बल्कि कर्म के आधार पर वैध ठहरा रहे हैं लेकिन अंततः तो वे इसे स्वीकृति दे ही रहे हैं और यह भी जतला रहे हैं कि ब्राह्मण सर्वश्रेष्ठ है और शुद्र निकृष्ट है जिसे महान श्रम करके ब्राह्मणत्व अर्जित करना है|आश्चर्य इस बात का है कि ठीक यही तर्क ब्राह्मणवादी भी देते हैं वे भी कर्म और श्रम के विभाजन के आधार पर ही वर्ण व्यवस्था की व्याख्या करते हैं और बड़ी आसानी से श्रमिकों के विभाजन के प्रश्न से बच निकलते हैं| श्रमिकों के विभाजन का प्रश्न अंबेडकर ने उठाया था और कहा था कि वर्ण या जाति व्यवस्था असल में श्रम का नहीं बल्कि श्रमिकों का विभाजन है| यहाँ यह नोट करना होगा कि भगवान रजनीश बाद के वर्षों में वर्ण व्यवस्था सहित जाति व्यवस्था को सिरे से नकारते हुए इसे नष्ट कर देने की बात भी करते हैं और कई प्रवचनों में वर्ण व्यवस्था सहित जाति व्यवस्था के जहरीले परिणामों की चर्चा करते हुए इसे अमानवीय बताते हैं|
    इस विषय में भी यही प्रश्न खडा होता है, कि समाज, वर्ण और जाति व्यवस्था पर गौर करते हुए एक आम आदमी या एक आम रजनीशी के मन में कौनसी सलाह ज्यादा गहराई से अंकित हो रही है या काम कर रही है? वर्ण व्यवस्था को उखाड़ देने की सलाह या वर्ण व्यवस्था को कृष्ण द्वारा कार्य गुण कर्म के अनुसार मानव का वर्गीकरण करने की सलाह? हम पाते हैं कि भगवान् रजनीश और कृष्ण की महिमा से प्रभावित एक आम भारतीय या रजनीशी असल में कृष्ण का समर्थन करने वाले वक्तव्य से प्रभावित है अंबेडकर का समर्थन करने वाले वक्तव्य से प्रभावित नहीं है| इस बात का परीक्षण करने के लिए किसी भी आम रजनीशी या अध्यात्मिक रुझान रखने वाले आम भारतीय हिन्दू से बात की जा सकती है|
  3. ध्यान और समाधि सहित मोक्ष के मुद्दों पर भी भगवान् रजनीश की प्रस्तावनाएँ एकदम पारम्परिक हैं| उनमे जिन प्रयोगों का उल्लेख है और जिन नवाचारों का उल्लेख है वे बहुत नए नहीं हैं| हाँ यह अवश्य है कि वे आम जन के प्रचलन से बाहर हो गये थे और केवल मठों और आश्रमों तक सीमित हो गए थे| न केवल वे प्रयोग बल्कि उनकी सांगत व्याख्याएं भी पहले से मौजूद थीं जिनका सरलीकरण और प्रचार भगवान रजनीश ने बहुत प्रभावशाली ढंग से किया| लेकिन यहाँ एक गहरी बात जो नोट करनी आवश्यक है वो ये कि इन ध्यान विधियों और इनसे जुड़े जिस मनोविज्ञान का वे प्रचार करते रहे उसकी दार्शनिक प्रष्ठभूमि क्या है? कोई भी आसानी से देख सकता है कि इस प्रष्ठभूमि में आत्मा, परमात्मा, पुनर्जन्म, कर्म का विस्तारित सिद्धांत, गुरु शिष्य परम्परा और कृपा या शक्तिपात आदि की पुरातन मान्यताएं हैं| ये मान्यताएं असल में ब्राह्मणवादी या वेदान्तिक मान्यताएं हैं दुर्भाग्य से इन्ही पर भारत में शोषण और दमन सहित अंधविश्वास और भाग्यवाद का पूरा भवन खडा है| ऐसे में इस मूलभूत ब्राह्मणवादी रहस्यवाद या धर्म दर्शन को प्रचारित करके वे ब्राह्मणवादी शोषण के तन्त्र को ही लाभ पहुंचा रहे हैं|
    हालाँकि वे बुद्ध या महावीर की प्रशंसा करते हुए परमात्मा या आत्मा तक को नकार देते हैं लेकिन वह उनकी मूल शिक्षा नहीं है| न ही उस शिक्षा ने उनके पूरे शिष्य समुदाय का निर्माण किया है| आज भी अगर उनके शिष्यों से यह पूछा जाए कि आत्मा और परमात्मा सहित पुनर्जन्म पर उनके क्या विचार हैं तो वे इन तीनों को स्वीकार करते हैं और पुनर्जन्म के स्मरण सहित पाप पुण्य के अगले या पिछले जन्म पर प्रभाव को भी मान्यता देते हैं| वे शून्य या अनत्ता पर आधारित ध्यान या निर्वाण की चर्चा नहीं करते हैं|
    इसके दो कारण हैं एक तो ये कि भगवान रजनीश सहित ओशो ने ही कभी भी शुन्य या अनत्ता की अलग से व्याख्या नहीं की है और न ही अनत्ता के आधार पर जन्म मरण या निर्वाण को समझाया है| दुसरा और अधिक महत्वपूर्ण कारण ये है कि भगवान रजनीश के अधिकाँश शिष्य वे हैं जो उनके द्वारा आत्मा और पुनर्जन्म आधारित ब्राह्मणी या वेदान्तिक रहस्यवाद से प्रभावित होकर उनके निकट आये हैं| अभी भी उनके प्रमुख शिष्य जिस तरह का संन्यास देते हैं और जिस तरह से साधना सिद्धि और निर्वाण की बात करते हैं वह आवागमन के चक्र से मुक्त होने की धारणा पर ही आधारित है|
    इसमें एक बात और ध्यान रखनी चाहिए कि भगवान् रजनीश और उनका परवर्ती अवतार ओशो, दोनों ही बारम्बार यह दोहराते हैं कि अनत्ता और आत्मा एक ही हैं और एक ही सत्य के दो नाम हैं| वे शून्य और पूर्ण को भी एक ही निरुपित करते हैं और इसे एक ही सत्य की दो अभिव्यक्तियाँ बताते हैं| साथ ही यह भी बतलाते हैं कि बुद्ध ने अव्याख्य की व्याख्या न करके जो निर्णय लिया था वह महान निर्णय था और यह मानते हैं कि जिस चीज की व्याख्या संभव न हो उसकी चर्चा नहीं करनी चाहिए| इस सन्दर्भ में वे लुडविनविटगिस्टीन का प्रसिद्द वक्तव्य भी दोहराते हैं कि जिस बात को समझाया न जा सके उसे उठाया ही नहीं जाना चाहिए|
    इस सन्दर्भ में अगर हम विचार करें कि उनका वृहत्तर शिष्य समुदाय किस बात से प्रभावित होकर उनके पास आ रहा है? क्या पूर्ण को शुन्य मानकर आ रहा है? या शुन्य को पूर्ण में अनुवाद करके उनके पास आ रहा है? भगवान रजनीश में एक प्रश्न के उत्तर में बुद्ध को प्रच्छन्न वेदांती कहा था यह वक्तव्य उन्होंने आदि शंकर पर उठाये गए एक प्रश्न के उत्तर में दिया था जिसमे रामानुज द्वारा शंकर को प्रच्छन्न बौद्ध निरुपित करने का उल्लेख किया गया था| अब ध्यान से देखना होगा कि उनका शिष्य समुदाय वास्तव में शंकर को प्रच्छन्न बौद्ध मान रहा है या बुद्ध को प्रछन्न वेदांती मान रहा है? ठीक से देखें तो पता चलता है कि यहाँ बुद्ध का ही वेदान्तीकरण या ब्राह्मणीकरण हो रहा है न कि शंकराचार्य का बौद्धिकरण|
  4. अध्यात्म, साधना और मुक्ति के प्रश्न पर भी भगवान् रजनीश की जो प्रस्तावनाएँ सर्वाधिक प्रचलित हैं वे गुरु शिष्य परम्परा और समर्पण, शरणागति पर आधारित हैं| तर्क, दुस्साहस, खतरे में जीना और अप्प दीपो भव् की बुद्ध की प्रस्तावना का वे जब तब समर्थन अवश्य करते हैं लेकिन यह उनकी मूल शिक्षा नहीं है| उनकी मूल शिक्षा, जिससे कि उनका अधिकतम शिष्य समुदाय प्रभावित है वह गुरु पर निर्भरता और सतत मार्गदर्शन देने वाले माडल पर आधारित है| बौद्ध अर्थ की अप्प दीपो भव वाली क्षण क्षण जागरूकता वाली शैली – जो कि ओशो के समकालीन कृष्णमूर्ति द्वारा सर्वाधिक प्रचारित की गयी – वह भगवन रजनीश या ओशो की मूल शिक्षा नहीं है|
    क्षणवाद और निर्विकल्प जागरूकता पर आधारित यह शैली या विधि (हालाँकि इसे विधि कहना पूरी तरह ठीक नहीं) पुनर्जन्म और आत्मा के नकार पर ही खड़ी है| इसकी मूल मान्यता यह है कि शरीर और मन सहित आत्मा (व्यक्तित्व या स्व) असल में प्रकृति और समाज के द्वारा दिए गए हैं और कोई आत्यंतिक व्यक्तित्व या स्व या आत्मा नहीं होती जो कि एक से दुसरे शरीर या जन्म में प्रवेश करती हो| न तो मैं और मेरे की तरह कोई शरीर है न स्व या व्यक्तित्व या आत्मा है| जो सत्ता स्व या आत्मा की तरह भासती है असल में वह एक झूठा आभास भर है जो शरीर, और समाज द्वारा दिए गए तात्कालिक व्यक्तित्व या मन के गठजोड़ द्वारा निर्मित होती है| शरीर की मृत्यु के बाद शरीर और मन के ये टुकड़े बिखर जाते हैं और अन्य शरीरों और मनों के निर्माण में उपयोग कर लिए जाते हैं| इस तरह वहां आत्मा या स्व जैसा कुछ नहीं है| बुद्ध के अनुसार इसी को अपने अनुभव से जान लेना निर्वाण या मुक्ति है|
    लेकिन भगवान् रजनीश और ओशो भी जिस ढंग से मोक्ष की व्याख्या करते रहे हैं वह ढंग सनातन आत्मा और परमात्मा को मान्यता देता है और इस आत्मा का परमात्मा में विलीन होना ही मोक्ष निरूपित किया गया है| अब प्रश्न यह उठता है कि आत्मा सनातन अर्थात अजर अमर है (गीता के अनुसार) तो वह परमात्मा में विलीन होकर भी बनी रहेगी| अर्थात वह पूर्ण रूप से विलीन होकर खो नहीं रही है बल्कि अपना सत्व या अपनी अस्मिता बचाए रख रही है| अगर कहें कि वह पूर्णतया विलीन हो जाती है या खो जाती है तो फिर अजर अमर या सनातन नहीं रही| इस प्रकार आत्मा की अमरता और मोक्ष दो विरोधी सिद्धांत हुए जिनमे से कोई एक ही सत्य हो सकता है| लकिन वेदांती रहस्यवाद या ब्राह्मणवाद इन्हें एकसाथ इस्तेमाल करता है| जबकि बुद्ध इसमें परमात्मा और आत्मा दोनों को निरस्त करके निर्वाण को बहुत तर्कसंगत और सबके लिए संभव बना देते हैं| बुद्ध के अनुसार “हमारा” कोई शरीर नहीं है और “हमारा” कोई मन/व्यक्तित्व/आत्मा नहीं है बल्कि शरीर भी चार भूतों का उत्पाद है और मन भी स्मृतियों, कल्पनाओं, विचारों, संस्कारों और वासनाओं का समुच्चय है|
    ये चार भूत अर्थात पदार्थ और ये संस्कार वासनाएं अर्थात मन ये सब बाहर से आता है अन्य व्यक्तियों, प्राणियों और वनस्पतियों से यह पदार्थ आते हैं और समाज, शिक्षा, परिवार से ये विचार आते हैं इसलिए शरीर सहित मन या व्यक्तित्व भी “मेरा” या “हमारा” नहीं है बल्कि समष्टि का है और उसी में खो जाता है| जो व्यक्ति आज नजर आ रहा है वह समय में पहली और अंतिम बार जन्मा है| उसका शरीर और उसका मन मर जाने के बाद उसके शरीर के भूतों का और उसके मन के संस्कारों का सौ प्रतिशत हिस्से का दुबारा एकसाथ किसी नए गर्भ में प्रवेश कर जाना लगभग असंभव है इसलिए नया व्यक्ति इस मरे हुए व्यक्ति के शरीर या मन के अंशों को धारण करते हुए भी पूरी तरह वो पुराना व्यक्ति नहीं है| इस प्रकार कोई पुनर्जन्म नहीं होता बल्कि हर जन्म एक नए व्यक्ति का जन्म होता है|
    अनत्ता को इस तरह “शरीर और मन दोनों ही मेरा नहीं है” और मैं और मेरा जैसी भी कोई सत्ता नहीं है के रूप में जान लेना ही निर्वाण कहा गया है| हालाँकि वेदान्त और ब्राह्मणवादी रहस्यवाद भी मुक्ति को मैं और मेरे से मुक्ति के अर्थ में ही देखते हैं लेकिन वे एक भयानक विरोधाभास का निवारण नहीं कर पाते| वो विरोधाभास यह है कि अगर आत्मा अमर है तो मोक्ष में विलीन कैसे हो जा सकती है या खो कैसे सकती है? और अगर मोक्ष ही अंतिम सत्य है या आत्मा व शरीर के अल्पकालिक अस्तित्व की तुलना में वही सर्वकालिक या सनातन सच्चाई है तो आत्मा शरीर की तरह एक क्षणिक सत्ता हुई| इस बिंदु पर आते ही हम बुद्ध के दर्शन में प्रवेश कर जाते हैं| अर्थात अनंत मोक्ष के सामने आत्मा क्षणिक ही साबित होती है| यही बुद्ध का सिद्धांत है, आत्मा या स्व असल में एक क्षणिक आभास मात्र है|
    अब इतने विस्तार में जाने के बाद हम यह देखेंगे कि एक आम रजनीशी या ओशो का सन्यासी आत्मा सहित मोक्ष को किस रूप में देखता है? अनुभव बताता है कि ओशो या भगवान रजनीश का एक आम सन्यासी भारत के एक आम धार्मिक हिन्दू की भांति आत्मा की अमरता को मानता है और परमात्मा से मिलन के अर्थ में ही योग और मोक्ष को स्वीकार करता है| इस प्रकार पुनः यह सिद्ध होता है कि भगवान् रजनीश या ओशो के शिष्य असल में बुद्ध के बताये अनत्ता और निर्वाण की प्रशंसा सुनकर ओशो या रजनीश के सन्यासी नहीं हुए हैं बल्कि वे वेदांती और ब्राह्मणवादी आत्मा और मोक्ष के सिद्धांत से प्रभावित होकर रजनीश या ओशो के निकट आये हैं|





SHARE
पिछली खबरपाकिस्तान और नेपाल हैं भारत से ज्यादा खुशहाल देश : द वर्ल्ड हैप्पीनेस रिपोर्ट 2017
अगली खबर हिंदी साहित्य जगत की पहली विस्तृत निर्देशिका
संजय जोठे एक चर्चित स्वतंत्र लेखक हैं। वे राजनैतिक, सामाजिक, धर्म, आध्यात्म और दलित विषयों पर बेबाक लेखन के लिए जानें जाते हैं। समता, न्याय और सम्मान के पैरोकार संजय हिंद वॉच मीडिया के लिए नियमित रूप से लिखते रहे हैं। हिंद वॉच मीडिया जमीनी सरोकारों से जुड़ी जनपक्षधरता की पत्रकारिता कर रहा है। साप्ताहिक अखबार, न्यूज़ पोर्टल, वेब चैनल और सोशल मीडिया नेटवर्क के माध्यम से जमीनी और वास्तविक ख़बरों को निष्पक्षता और निडरता के साथ अपने पाठकों तक पहुंचाने के लिए हिंद वॉच मीडिया पूरी समर्पण से काम करता है। भारत और विदेशों में यह वेब पोर्टल पढ़ा जा रहा है।