बीमार नागरिकों का देश कैसे बन पाएगा विश्वगुरु ?

देश में जिस तरीके से सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं को बर्बाद किया गया है और प्राइवेट सेक्टर महंगे हुए हैं, उसे देखते हुए राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति के लक्ष्य के पूरा होने की संभावना पर शक पैदा होता है।

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(प्रतीकात्मक तस्वीर)
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साल 2015 में भारत में करीब 28 लाख टीबी के मरीज थे। भारत में टीबी के मरीजों की संख्या अनुमान से तीन गुणा ज्यादा हो सकती है। एक अध्ययन में पाया कि भारत में निजी क्षेत्र में करीब 19 लाख से लेकर 53 लाख तक मरीजों का इलाज किया जा रहा है, जो सरकारी अस्पतालों में इलाज करा रहे मरीजों की संख्या से दोगुनी है। भारत में टीबी के कुल मामलों में से 10 फीसदी बच्चों में होते हैं, लेकिन सिर्फ छह फीसदी का ही पता चल पाता है। दुनिया में 35 करोड़ लोग डायबिटिज के शिकार हैं। भारत में ही सिर्फ 6.3 करोड़ डायबिटिज के मरीज हैं।

बात इतनी भी पुरानी नहीं है कि आपको वह घटना याद न हो जिसमें गोरखपुर के सरकारी अस्पताल में ऑक्सीजन के सप्लायर का बिल नहीं चुकाने के कारण ऑक्सीजन की आपूर्ति बाधित होने से नौनिहालों का दम घुट गया था। अब दिल्ली आइए, देश की राजधानी। यहां पांच सितारा अस्पताल है। जहां जिन्दा बच्चे को मृत बता दिया जाता है, क्योंकि परिवार ने लाखों रुपए देने में असमर्थता जताई थी। दिल्ली के बगल में ही आईटी हब है गुरुग्राम। यहां के फोर्टिस अस्पताल में एक बच्ची डेंगू जैसी बीमारी से मर जाती है और बिल आता है 27 लाख रुपए। परिवार मीडिल क्लास है, जिसके पास दस लाख रुपए का बीमा था। बाकी पैसा उस परिवार ने कैसे चुकाया होगा?

2015 में भारत में हरेक दिन 321 बच्चों की डायरिया से मौत हुई। ये रिपोर्ट विश्व स्वास्थ्य संगठन की है। भारत में 5 साल से कम उम्र के बच्चों की मौत का ये दूसरा सबसे बड़ा कारण है। गौरतलब है कि डायरिया गन्दे पानी पीने की वजह से होती है। नतीजतन, ये आंकड़ा साबित करता है कि भारत में साफ-सफाई और पीने के पानी की क्या स्थिति है? 2015-16 में आधे के करीब बच्चों को ही ओआरएस की सप्लाई की जा सकी थी, जिससे भारत की हेल्थ सिस्टम की दुर्दशा का पता चलता है। भारत के मुकाबले 2015 में पाकिस्तान, केन्या, म्यान्मार जैसे देशों में डायरिया से कम मौतें हुईं। डायरिया की रोकथाम के लिए रोटावायरस का टीका लगाया जाता है, लेकिन ये टीका सरकार के मिशन इन्द्रधनुष कार्यक्रम में शामिल नहीं है। प्राइवेट अस्पतालों से ये टीका काफी महंगा मिलता है। दूसरी तरफ, दुनिया भर में भारत सबसे अधिक टीबी प्रकोप से ग्रसित है। साल 2015 में भारत में करीब 28 लाख टीबी के मरीज थे। भारत में टीबी के मरीजों की संख्या अनुमान से तीन गुणा ज्यादा हो सकती है। मशहूर मेडिकल पत्रिका लेसेंट ने साल 2014 में किए गए एक अध्ययन में पाया कि भारत में निजी क्षेत्र में करीब 19 लाख से लेकर 53 लाख तक मरीजों का इलाज किया जा रहा है, जो सरकारी अस्पतालों में इलाज करा रहे मरीजों की संख्या से दोगुनी है। भारत में टीबी के कुल मामलों में से 10 फीसदी बच्चों में होते हैं, लेकिन सिर्फ छह फीसदी का ही पता चल पाता है।

एक सबसे खतरनाक ट्रेंड मधुमेह यानी डायबिटिज को लेकर देखने को मिल रहा है। दुनिया में 35 करोड़ लोग डायबिटिज के शिकार हैं। भारत में ही सिर्फ 6.3 करोड़ डायबिटिज के मरीज हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, 2030 तक डायबिटीज लोगों की मौत का सातवां सबसे बड़ा कारण होगा। खतरनाक ट्रेंड ये है कि डायबिटिज आज शहरी गरीबों में तेजी से फैल रहा है। चीन के बाद भारत में सबसे अधिक डाइबिटिज पीड़ित हैं। ये जाहिर तौर पर जीवन शैली और खाने की वजह से है।

जब 2017 में केंद्रीय कैबिनेट ने राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2017 को हरी झंडी दिखाई तो एक उम्मीद जगी। लेकिन, देश में जिस तरीके से सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं को बर्बाद किया गया है और प्राइवेट सेक्टर महंगे हुए हैं, उसे देखते हुए राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति के लक्ष्य के पूरा होने की संभावना पर शक पैदा होता है।

भारत को विश्व की मधुमेह राजधानी के रूप में जाना जा रहा है और 2025 तक यहां 5 से 7 करोड़ मधुमेह रोगी होने की आशंका है। भारत सरकार ने 2008 में जन औषधि केंद्र खोले थे। मोदी सरकार ने इसे प्रधानमंत्री जन औषधि योजना का नाम दिया है और इसका विस्तार कर रही है। लेकिन, सच्चाई ये है कि राजस्थान, उत्तराखंड, आंध्र प्रदेश और पश्चिम बंगाल में खुले जन औषधि केंद्र बंद हो चुके हैं या हो रहे हैं। 2014 तक 178 जन औषधि केंद्र 16 राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों में खोले गए थे, जिसमें मात्र 98 ही कार्यरत हैं। एक तरफ, फार्मेसी कंपनियां अस्सी हजार करोड़ रुपये से अधिक घरेलू बाजार में दवाओं की बिक्री कर रही हैं, वहीं जेनरिक दवाएं दो करोड़ के आस-पास ही बिक पा रही हैं। दरअसल, ब्रांडेड दवा कंपनियों के मेडिकल रिप्रजेंटेटिव्स शहर के डॉक्टरों को दवाओं के सैंपल के साथ-साथ महंगे गिफ्ट आइटम्स भी देते हैं। डॉक्टर दवा कंपनियों को फायदा पहुंचाने के लिए मरीजों को ब्रांडेड कंपनियों की दवा खरीदने को कहते हैं। दूसरी तरफ, जेनरिक दवा कंपनियां ऐसा नहीं कर पाती हैं, इसीलिए गरीबों को सस्ते दर पर दवा तक नहीं मिल पाती।

इसके अलावा, देश के अन्य विकास सूचकांक की बात करें तो बच्चों में कुपोषण, महिलाओं में एनिमिया यानी खून की कमी की घटनाएं आम हैं। शिशु मृत्यु दर, प्रसव के दौरान महिला मृत्यु में भी जो कमी आनी चाहिए, वो अब तक हासिल नहीं की जा सकी है। ऐसे में जब 2017 में केंद्रीय कैबिनेट ने राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2017 को हरी झंडी दिखाई तो एक उम्मीद जगी लेकिन, देश में जिस तरीके से सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं को बर्बाद किया गया है और प्राइवेट सेक्टर महंगे हुए हैं, उसे देखते हुए राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति के लक्ष्य के पूरा होने की संभावना पर शक पैदा होता है। यह स्थिति तब है, जब भारत दुनिया की सबसे तेज़ी से आगे बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था है। नई स्वास्थ्य नीति में सबके लिए स्वास्थ्य के सिद्धांत पर काम करते हुए कमज़ोर वर्ग के लोगों को मुफ्त दवा और इलाज की सुविधा उपलब्ध कराना है। साथ ही स्वास्थ्य क्षेत्र में बजट को बढ़ाकर जीडीपी के 2.5 प्रतिशत के स्तर तक लाना, जो अभी 1.5 प्रतिशत है। इसके अलावा बीमारियों, शिशु मृत्यु दर और मातृ मृत्यु दर में कमी लाने के साथ जीवन प्रत्याशा को बढ़ाने का भी लक्ष्य निर्धारित किया गया है। नई नीति में सरकार का ध्यान प्राथमिक स्वास्थ्य पर अपेक्षाकृत अधिक केंद्रित करने की बात कही गई है। बड़ी बीमारियों के इलाज के लिए निजी क्षेत्र पर भी निर्भर होने की बात की गई है, यानी इसके लिए प्राइवेट अस्पतालों का सहयोग लिया जाएगा। लेकिन प्राइवेट अस्पतालों से जुड़ी घटनाएं कुछ और ही कहानी बयान करती है। इस नीति में प्राइवेट सेक्टर को भी इससे जोड़ दिया गया है। गौरतलब है कि बड़े निजी अस्पतालों में आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्ग के लोगों के लिए मुफ्त इलाज की व्यवस्था है, लेकिन ज़मीनी सच्चाई यह है कि दिल्ली जैसे शहर में भी इस आदेश का पालन नहीं होता। गौरतलब है कि जब 2015 में राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति का ड्राफ्ट जारी किया जा रहा था, तब इसमें हेल्थ को अधिकार बनाने का प्रस्ताव था, लेकिन बाद में उसे हटा दिया गया।

अगस्त 2017 में इंडियन मेडिकल एसोसिएशन की ओर से जारी आंकड़ों के मुताबिक भारत के 1.3 अरब लोगों का इलाज करने के लिए भारत में मात्र 10 लाख एलोपैथिक डॉक्टर हैं। इनमें से 1.1 लाख डॉक्टर सार्वजनिक स्वास्थ्य क्षेत्र में काम करते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में करीब 90 करोड़ आबादी स्वास्थ्य की देखभाल के लिए इन थोड़े से डॉक्टरों पर ही निर्भर है। आईएमए ये मानता है कि डॉक्टरों और मरीजों के अनुपात में इस अंतर के कारण सरकारी अस्पतालों में एक बेड पर दो मरीजों तक को रखना पड़ता है। सरकारी डॉक्टर भी काम के दबाव से ग्रस्त हैं। इस वजह से भी सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा की गुणवत्ता पर काफी बुरा असर पड़ता है और लोग मजबूरी में प्राइवेट सेक्टर की तरफ जाते हैं।





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