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राजनीति का ऊंट कब किस करवट पलट जाए, कहा नहीं जा सकता। एक समय पर जो राजनीतिक दल एक दूसरे के घोर विरोधी होते हैं वे समय बदलते देख साथी बन जाते हैं। कभी यही साथी मौका बदलते देख दामन छुड़ा कर अपने रास्ते भी निकल जाते हैं।

यह भाव हाल फिलहाल भाजपा के दिल में आ रहा होगा क्योंकि शिवसेना ने अगले 2019 के विधानसभा चुनाव में उसका साथ छोड़ने का मन बना लिया है।
दरअसल केंद्र में सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की करीब दो दशक से अहम सहयोगी रही

शिवसेना ने उसे तगड़ा झटका दिया है।
शिवसेना की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में 2019 के लोकसभा और विधानसभा चुनाव बीजेपी से अलग लड़ने का फैसला किया गया है।

बता दें कि शिवसेना महाराष्ट्र और केंद्र में बीजेपी की अहम सहयोगी है। महाराष्ट्र में दोनों दलों की मिलीजुली सरकार है।

हाल के दिनों में महाराष्ट्र सरकार में शिवसेना और बीजेपी के बीच तकरार चल रही है। दोनों पार्टी के नेता एक-दूसरे पर बयानबाजी कर रहे हैं।

शिवसेना ने अपने मुखपत्र ‘सामना’ के जरिए हाल के दिनों में नरेंद्र मोदी सरकार की कई मुद्दों पर आलोचना की है। शिवसेना पीएम मोदी के अहम फैसले नोटबंदी का विरोध कर रही थी।

जाहिर है इतनी तल्खी के बीच दोनों का गठबंधन टूटना तय था। अब यहां पेंच यह है कि कहीं ऐसा न हो कि भाजपा का कद और समय बदलता देख फिर शिवसेना यूटर्न न मार ले। क्योंकि राजनीति में कुछ भी स्थायी नहीं होता।