Sunday, February 17, 2019
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आंबेडकर ( कविता)- बिपिन गोहिल

पाँच हजार साल बाद इन अँधेरी गलियों में अभी-अभी सूरज की कुछ किरणें फैलीं उजाला हुआ पल में गिरे हैं कुछ खंडहर अभी अभी जमीं में गाड़ दिया था जिन्हें वे सर...

नाँव मंत्री के अब रटींला हम (कविता)- बेढब बनारसी

नाँव जेकर बहुत जपींला हम ऊ त गुमनाम हौ सुनींला हम शिव क, दुर्गा क पाठ का होई नाँव मंत्री क अब रटींला हम जब से देखलीं ह...

टैगोर और अंधी औरतें (कविता)- बोधिसत्व

बरस रहा था देर से पानी भीगने से बचने के लिए मैं रुका था दक्षिण कलकत्ता में एक पेड़ के नीचे, वहीं आए पानी से बचते-बचाते परिमलेंदु बाबू। परिमलेंदु बाबू टैगोर...

आदिवासी औरत रोती है (कविता)- महेश वर्मा

आदिवासी औरत रोती है गुफाकालीन लय में। इसमें जंगल की आवाज़ें हैं और पहाड़ी झरने के गिरने की आवाज़, इसमें शिकार पर निकलने से पहले जानवर...

श्राद्ध का अन्न (कविता)- अरुण कमल

श्राद्ध का अन्न खा लौट रहे तेज कदम दूर गाँव के ग्रामीण जोर जोर से बतियाते व्यंजनों का स्वाद मृतक का आचार व्यवहार लगाते ठहाका भूँकते कुत्तों को...

अजनबी देश है यह (कविता) -सर्वेश्वरदयाल सक्सेना

अजनबी देश है यह, जी यहाँ घबराता है कोई आता है यहाँ पर न कोई जाता है जागिए तो यहाँ मिलती नहीं आहट कोई, नींद में जैसे...

इतवार और तानाशाह (कविता)- मणि मोहन

आज इतवार है अपने घर पर होगा तानाशाह एकदम अकेला... क्या कर रहा होगा ? गमलों में लगे फूलों को डाँट रहा होगा ! हाथों में कैंची लिए लताओं के पर...

जिंदा रहना चाहता है इंसान (कविता)- बोरीस स्लूत्स्की

जिंदा रहना चाहता है जिंदा इंसान। जिंदा रहना चाहता है मौत तक और उसके बाद भी। मौत को स्थगित रखना चाहता है मरने तक निर्लज्ज हो चाहता...

सौ-सौ चीते (कविता)- अजय पाठक

बची हुई साँसों पर आगे जाने क्या कुछ बीते एक हिरण पर सौ-सौ चीते। चलें कहाँ तक, राह रोकती सर्वत्र नाकामी कहर मचाती, यहाँ-वहाँ तक फैली सुनामी नीलकंठ हो गए जगत...

नाक की लौंग (कविता)- मार्तिन हरिदत्त लछमन श्रीनिवासी

कविता के साथ यह शहर रोशनी में आता है। मैं तुमसे वह देखता हूँ जो मुझसे अनजाना और अनभिज्ञ है। गहराई से प्यारा और नाजुक है वासंती हवा के...