Print Friendly, PDF & Email

‘गुरु गोविंद दोउ खड़े काके लागू पांव,
बलिहारी गुरु आपने गोविंद दियो बताए’।।
उक्त पंक्तियों में गुरु की महता का स्पष्ट रूप से वर्णन किया गया है। कहा गया है कि अगर गुरुजी और भगवान दोनों एक साथ खड़े हों तो सबसे पहले गुरूजी के पांव छूकर आशीर्वाद लेना चाहिए क्यूंकि अगर गुरु नहीं होते तो हमें ईश्वर से परिचित कौन करवाता। वैसे तो दुनिया के सभी देशों में शिक्षक सम्माननीय होते हैं लेकिन भारत एक ऐसा देश है जहाँ गुरु को देवतुल्य माना जाता है। यहां सिख धर्म की पूरी परंपरा और इतिहास गुरुओं की कुर्बानियों और शिक्षा पर आधारित है। यहाँ तक कि सिख धर्म में किसी भगवान की मूर्ति की जगह गुरुग्रंथ साहब जो कि पवित्र धार्मिक पुस्तक है, उसी के सामने मत्था टेक कर अरदास की जाती है।

दुनिया में किसी धार्मिक पुस्तक को गुरु का दर्जा सिर्फ भारत में ही दिया गया। इसी तरह सनातन मान्यता में भी गुरु की महानता का गुणगान और उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का विशेष दिवस होता है गुरु पूर्णिमा, जो इस वर्ष आने वाली 27 जुलाई को मनाया जाएगा।

आषाढ़ शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा के रूप में पूरे देश में उत्साह के साथ मनाया जाता है। भारतवर्ष में कई विद्वान गुरु हुए हैं, किन्तु महर्षि वेद व्यास प्रथम विद्वान थे, जिन्होंने सनातन धर्म के चारों वेदों की व्याख्या की थी। कहा जाता है कि आषाढ़ पूर्णिमा को आदि गुरु वेद व्यास का जन्म हुआ था। उनके सम्मान में ही आषाढ़ मास की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है।

जीवन में गुरु और शिक्षक के महत्व को आने वाली पीढ़ी को बताने के लिए यह पर्व आदर्श है। व्यास पूर्णिमा या गुरु पूर्णिमा अंधविश्वास के आधार पर नहीं बल्कि श्रद्धाभाव से मनाना चाहिए। गुरु का आशीर्वाद सबके लिए कल्याणकारी व ज्ञानवर्द्धक होता है, इसलिए इस दिन गुरु पूजन के उपरांत गुरु का आशीर्वाद प्राप्त करना चाहिए। सिख धर्म में इस पर्व का महत्व अधिक इस कारण है क्योंकि सिख इतिहास में उनके दस गुरुओं का बेहद महत्व रहा है।