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अमेरिकन फाउंडेशन फॉर सुसाइड प्रीवेंशन यानी एएफ़एसपी की रिपोर्ट चौंकाने वाली है। इस रिपोर्ट के मुताबिक़ अमेरिका में हर साल करीब 400 से ज्यादा फिजिशियन्स आत्महत्या करते हैं। मेडिकल स्टूडेंट्स भी इस फेहरिश्त में आते हैं। इस बात पर तब ज्यादा ध्यान से आंकड़े जुटाए गए जब मेडिकल के फोर्थ इयर के स्टूडेंट ने माउंट सिनाई मेडिकल स्कूल में आत्महत्या कर ली।
भारत में हर साल एक लाख से ज्यादा लोग आत्महत्या करते हैं, जो विश्व के औसत का बड़ा हिस्सा है। सरकारी आंकड़ों* के अनुसार 2014 में 1,31,666 लोगों ने आत्महत्या की। आत्महत्या करने वालों में 80% लोग साक्षर थे, जो देश की राष्ट्रीय साक्षरता दर 74% से अधिक है। सवाल यह है कि लोग ऐसा चरमपंथी कदम उठाने का फैसला क्यों करते हैं; आखिर ऐसा क्या है जिसके चलते वे जीवन का मोह त्याग देते हैं?
18 सितंबर भाषा राम मनोहर लोहिया आरएमएल अस्पताल के एक जूनियर डॉक्टर ने आज मध्य दिल्ली के ओल्ड राजेंद्र नगर इलाके में स्थित अपने घर पर कथित रूप से फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली। मृतक सिद्धार्थ शंकर महापात्र अस्पताल के स्नातकोार चिकित्सा शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान पीजीआईएमईआर के एनेस्थिसियोलॉजी विभाग में स्नातकोार प्रथम वर्ष का छात्र था और ओडिशा का रहने वाला था। पुलिस ने दावा किया कि घटनास्थल से कोई सुसाइड नोट नहीं मिला लेकिन ऐसे संकेत मिले हैं कि सिद्धार्थ अवसादग्रस्त था।
इसके पीछे की प्रमुख वजह है, तनाव, मानसिक बीमारिया और मेडिकल स्टडी की जबरदस्त टेंशन। अध्ययन यह भी बताता है कि आम लोगों की तुलना में फिजिसियंस में आत्महत्या करने की प्रवृत्ति ज्यादा होती है। आंकड़ों की बात करें तो पुरुष फिजिसियन में आम लोगों की तुलना में आत्महत्या करने की दर 1। 41 गुनी ज्यादा होते है जबकि महिला फिजिसियन में यही दर आम महिलाओं के मुताबिक़ 2।27 गुना ज्यादा होती है। इसमें मेडिकल स्टूडेंट्स भी शामिल किये जा सकते हैं। अमेरिकी जर्नल ऑफ़ साइकोलॉजी की इस शोध से यह तो पता चलता है कि मेडिकल स्टूडेंट्स और फिजिसियन में बढ़ती आत्महत्या की पृवृत्ति खतरनाक है लेकिन इसका जवाब अभी तक किसी शोध में नहीं आया है कि मेडिकल जगत से तालुक रखने वाले ये डाक्टर्स और मेडिकल छात्र डिप्रेशन, मेंटल इलनेस, वर्क लोड जैसी समस्याओं से दूसरों को निजात दिलाने का दावा करते हैं लेकिन खुद क्यों इन समस्याओं से नहीं उभर पाते?